Tuesday, February 19, 2008

चोखेर बाली आगंतुक कथा वाया स्टेट काउंटर

सराय से मिले पैसे से हम बौद्धि‍क रूप से गुलाम तो खैर हो ही रहे थे :) पर साथ ही साथ एक काम और कर रहे थे (आप चाहें तो मान लें कि ये काम गौण था) यह था शोध करना। इस दौरान आंकड़ों में मतलब आवाजाही वगैरह के, झांकने के काम में कुछ कुछ समझ बनी थी। शायद इसलिए ही सुजाता ने जो चोखेरबाली देखती हैं मुझे आदेश  (छोटों के आग्रह भी आदेश होते हैं और बड़ों के आदेश भी सलाह भर:))  दिया कि चोखेरबाली के स्‍टेटकाउंटर आंकड़े देखूं, ये क्‍या कहते हैं...मैंने उस एक्‍सेल फाइल को देखा और कुछ कुछ हैरानी हुई। इससे पहले एग्रीगेटरों के आंकड़ों को देखा था और उन पर पोस्‍ट लिखीं थीं। अपने खुद के ब्‍लॉगों के आंकड़ें देखते हैं और उनपर कोई पोस्‍ट नहीं लिखते :)। पर चोखेरबाली के आंकड़ों में कुछ अलग बात है-

chokherbalistat

आप कह सकते हैं कि इसमें अलग क्‍या है, आखिर चोखेरबाली एक नया ब्‍लॉग है सिर्फ दस दिन पुराना उस लिहाज से 220 की औसत से पेजलोड कम नहीं है। पर हमारा इशारा उस ओर नहीं है हम कहना चाहते हैं कि पेजलोड और यूनीक विजीटर के बीच का अंतराल देखें।औसत पेजलोड हैं 219 और यूनीक विजीटर औसत 76. इतना अधिक अंतराल सामान्‍यत: एग्रीगेटरों में तो देखा जाता है- मसलन नारद की विवादकालीन आवाजाही में यूनीक विजीटर व पेजलोड के बीच इतना अधिक अंतर था किंतु किसी ब्‍लॉग के लिए ये कुछ सामान्‍य नहीं है।

आसान भाषा में इसका क्या मतलब है ? हमारी अनंतिम सी व्‍याख्‍या इस प्रकार है-

  1. सबसे पहली बात तो यह कि सामुदायिक ब्लॉगों और निजी ब्‍लॉगों के ट्रेफिक पैटर्न में अंतर है- अगर मोहल्‍ला और भड़ास या हिन्‍दयुग्‍म के आंकड़ों से तुलना करें तो और बेहतर तस्‍वीर मिले पर प्रथम दृष्‍टया तो लगता है कि सामुदायिक ब्‍लॉग लोग अलग अपेक्षाओं से पढ़ते हैं। पोस्‍ट संख्‍या का अधिक होना भी एक भूमिका अदा करता है।
  2. लेकिन मूल बात जो चोखेरबाली में दिखाई दे रही है वह यह है कि ये वाकई चोखेरबाली है, खटकने वाला ब्‍लॉग...कुछ लोग बार बार वापस आकर देख रहे हैं...हम्‍म क्‍या हुआ...क्‍या हुआ। बाकी जबरदस्‍त इग्नोर मार रहे हैं।
  3. क्‍यों झांक रहे हैं बार बार...? मुझे लगता है टिप्‍पणियॉं।। जी संभवत पहली बार ब्‍लॉग में पोस्‍ट से ज्‍यादा आकर्षण टिप्‍पणियों का है, इतना कि टिप्‍पणियॉं ट्रेफिक ला रही हैं।इस ब्‍लॉग पर 'अच्‍छा है' लिखने वाले आमतौर पर नदारद है ( चिट्ठे 'अच्‍छा है' के खिलाफ तो बाकायदा झंडा लिए है, कुछ अच्‍छा नहीं है, हम पतनशीला हैं, बोलो क्‍या कल्‍लोगे) और टिप्‍पणियॉं लंबी हैं विमर्शात्‍मक हैं तल्ख भी हैं।
  4. एक अन्‍य अपुष्‍ट बात ये है कि एग्रीगेटरों के स्थान पर चिट्ठासंसार में अब ध्रुवीकरण सामुदायिक ब्‍लॉगों के इर्द गिर्द होने वाला है- इस विषय पर अगली किसी पोस्‍ट में लिखूंगी।

जो बात आंकड़ों से नहीं दिख रही वह यह कि इस चिट्ठे को लेकर ही ऐसी विचित्र प्रतिक्रिया क्‍यों है? पर इस बात को समझने के लिए आंकड़ों को नहीं समाज को देखने की जरूरत है। चिट्ठों में स्त्रियों से 'भाभीजी', 'माताजी' खानपान, हे हे हे टाईप लेखन की उम्‍मीद रही है। चोखेरबाली चुभने के लिए आया है और चुभ रहा है।

डिस्‍क्‍लेमर : कमलजी व आलोकजी शेयरटिप्‍स देते हुए लिख देते हैं कि इस कंपनी में लेखक का निवेश हो सकता है...हम भी कहे देते हैं कि यूँ हमने आंकड़ों का ही विश्‍लेषण किया है पर चोखेरबाली के हम भी सदस्‍य हैं।

Thursday, February 7, 2008

चंद औरतों (जो हसीन नहीं थीं ) के खुतूत

मोहल्ला और भडास सफल हुए ! इन सामुदायिक ब्लॉगों ने ब्लॉग जगत में जिस सामाहिक अवचेतन को लिंकित करने की परंपरा शुरू की थी शायद उसी का नतीजा है स्त्री विमर्शों पर स्त्रियों शुरू किया गया ब्लॉग " चोखेर बाली " !मैंने अपने शोध निष्कर्ष में अस्तित्व की छटपटाहट को हिंदी ब्लॉगित जाति का बेसिक फिनामिना घोषित किया था ! शायद इसी विचार को पुष्ट करता है यह नया ब्लॉग !  स्त्री का अपनी अस्मिता की प्राप्ति का संघर्ष और स्त्रीत्व के विचार को आंदोलनगामिता की शरण से लौटा लाने का प्रयास है यह ब्लॉग ! इस ब्लॉग की टैग लाइन कहती है -"इससे पहले कि वे आ के कहें हमसे हमारी ही बात हमारे ही शब्दों में और बन जाएँ मसीहा हमारे , हम आवाज़ अपनी बुलन्द कर लें ,खुद कह दें खुद की बात ये जुर्रत कर लें ...."! इस ब्लॉग में शामिल हैं हिंदी ब्लॉग जगत की स्त्री लेखिकाएं-

'चोखेर बाली' को बने सिर्फ कुछ ही घंटे हुए हैं पर हिंदी चिट्ठाजगत में इसकी चर्चा पर सुगबुगाहटें होने लगीं हैं ! इस ब्लॉग को लेकर आशा उम्मीदों कामनाओं का माहौल नहीं बना वरन खते हैं आप लोंगों में कितना दम है -सरीखी तमाशबीनी पिकनिकी दृष्टि से इसका स्वागत किया जा रहा है ! आज हमें बहुत दिन पहले उठाए गए सवाल -"ब्लॉग जगत में महिलाऎ इतनी कम क्यों हैं "-का जवाब मिलने लगा है ! दरअसल ब्लॉग जहत का ढांचा भी हमारी संरचना का एक हिस्सा भर ही है ! इसलिए यहां स्त्री विमर्श और संघर्ष के मुद्दों का उठना-गिरना -गिरा दिया जाना -हाइजैक कर दिया जाना -कुतर्की, वेल्‍ली और छुट्टी महिलाओं का जमावडा करार दे दिया जाना ---जैसी अनेक बातों का होना बहुत सहज सी प्रतिक्रिया माना जाना चाहिए ! जब प्रत्यक्षा कहती हैं कि अब ब्लॉग लिख रही औरतों से यह सवाल मत पूछिएगा कि आप ब्लॉग लिखती हैं तो खाना कौन बनाता है ? -तो हमारे सामने ब्लॉग जगत का  स्त्री के प्रति असंवेदनशील नजरिया डीकोड हुए बिना नहीं नहीं रहता ! जब नोटपैड  " चोखेर बाली " का मायना बताती हैं तो हमारे सामने अपनी जगह के लिए बराबरी से संघर्ष करती और मर्दवादी दृष्टिकोणों के सामने दो टूक जवाबतलब करती औरत का वजूद आ खडा होता है !नोटपैड लिखती हैं-

" आज भी समाज जहाँ ,जिस रूप में उपस्थित है - स्त्री किसी न किसी रूप में उसकी आँखों को निरंतर खटकती है जब वह अपनी ख्वाहिशों को अभिव्यक्त करती है ; जब जब वह अपनी ज़िन्दगी अपने मुताबिक जीना चाह्ती है , जब जब वह लीक से हटती है । जब तक धूल पाँवों के नीचे है स्तुत्य है , जब उडने लगे , आँधी बन जाए ,आँख में गिर जाए तो बेचैन करती है । उसे आँख से निकाल बाहर् करना चाहता है आदमी ।
दूसरी बात शास्त्री जी के बहाने बाकि पुरुष ब्लॉगरों से । वे कल रचना की पोस्ट देखते हुए यहाँ आये । अच्छा लगा । आते रहें ।उनकी टिप्पणी है -
Shastri said...
यह चिट्ठा आज ही मेरी नजर में आया. यहां हमारे चिट्ठालोक के स्त्रीरत्न कई बातें कहने की कोशिश कर रही हैं. नियमित रूप से पढूंगा. देखते हैं कि कुल मिला कर आप लोग क्या कहना चाहते हैं."

चोखेर बाली आंख की किरकिरी बन गई आफतों का ब्लॉग है ? या फिर यह हमारे समाज के सबसे अ संवेदनशील तबके की स्त्री के लिए असंवेदनशीलता को इंगित करने की मजाल रखने वाला जरिया है ! यह ब्लॉग औरत की बेमतलब की कुंठाओं और दर्द से फटी बेसुरी आवाज है ? या कि कुछ नादान ,सिरफिरी मर्दाना बेशर्म औरतों की फालतू टाइम को काटने की मंशा से आ जुटी हैं और फालतू का शोरशराबा करती फिर रही हैं ? ..........सवाल कई उठ रहे हैं , उठेंगें भी ! आप साफ साफ नहीं कह रहे होंगे सराहना भी कर रहे होंगें ,तब भी सदियों का सीखा हुआ मर्दवाद सिर उठाएगा ही ! आप कुछ ऎसा कह जाऎंगे कि उसकी सूक्ष्म अंडरटोन आपके मन को नग्न कर जाएगी ! आप बिफर उठेंगे ! आप कहेंगे आपका मन साफ था , वहां औरत के लिए इज्जत थी ! और फिर आप निष्कर्ष देंगे सूत्र वाक्य कहेंगे -औरतों के बारे में अंतिम फतवा आप ही देंगे ......! 

तो क्या चोखेर बाली का अंजाम यही होगा ! पागलपन और असंतोष की शिकार आधी आबादी, बेदखली की डायरी लिखने वाली, आंख की किरकिरी ,प्रत्यक्ष को प्रमाण न मानने की जिद ठाने , अंतहीन आकाश में अस्तित्वहीन चिडिया की चहचहाहट को दर्ज करती औरत --क्या चोखेर बाली की आजादी मुमकिन हो पाएगी ?

Wednesday, January 9, 2008

हिंदी ब्लागिंग के भड़ास काल के बाद के बारे में आपने सोचा है?

 

हिंदी ब्लागिंग के भड़ास काल के बाद के बारे में आपने सोचा है?

                                                               यशवंत

यशवंत का यह लेख उनके चिट्ठे पर आया था पर जैसा कि भड़ास के लेखों के साथ अकसर हो जाता हे कि लगातार नए लेखों के आते रहने के कारण यह जलद ही आर्काइव में दब गया। लेख अहम लगा इसलिए पुन: प्रस्‍तुत है, देखें-

ब्लागिंग का भड़ास काल
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जिस तेजी से मीडिया के भाई बंधु ब्लाग बना रहे हैं और अपनी अपनी भड़ास को अपने अपने ब्लाग पर उजागर कर रहे हैं, इसी तरह जो गैर मीडिया ब्लागर हैं वे जिस तरह अपने लेखन में अपने अनुभवों, अपनी पृष्ठभूमिक, अपनी सोच के आधार पर खुली व तीखी बातें साहस के साथ कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि हिंदी ब्लागिंग के इस शैशव दौर को भड़ास काल (यहां भड़ास शब्द का इस्तेमाल भड़ास ब्लाग के चलते नहीं बल्कि, ब्लागिंग के ट्रेंड को समझने के लिए स्वतंत्र शब्द के बतौर इस्तेमाल किया जा रहा है) के नाम से याद किया जाएगा। ब्लागर वो कह रहे हैं जो उनके दिल में है, जो उनके दिमाग में है, जो उनके अनुभवों से उपजी है। जो उनकी दिनचर्या में घटी है। जो उनके सामने, साइड या पड़ोस में है। जो चर्चा में है। बस, आन किया कंप्यूटर और लिख दी अपनी बात।
आइए कुछ उदाहरणों पर बात करें...

--प्रसिद्ध पत्रकार और संपादक बालेंदु दधीचि का अपना एक ब्लाग है जिसमें वो मीडिया की पोल खोलते हैं। अभी जो उनकी लैटेस्ट पोस्ट है उसमें एक अखबार में तस्वीर किसी व्यक्ति की और कैप्शन व स्टोरी किसी की प्रकाशित किए जाने की गलती का खुलासा किया।
--ब्लागिंग में हाल फिलहाल एकाएक चर्चित हुए पद्मनाभ मिश्र का ब्लाग है मेरा बकवास और उन्होंने इस ब्लाग में अपनी भड़ास कुछ यूं निकाली की उन्होंने प्रभु चावला की बेटी की छेड़खानी किए जाने संबंधी बात कहकर मीडिया के सनसनीखेज व हवा-हवाई वाले वर्तमान ट्रेंड को उजागर किया। बाद में उनकी इस रचना को लेकर कई ब्लागरों ने अपने अपने तरीके से भड़ास निकाली।
--कई मीडियाकर्मी ऐसे हैं जो लिखना तो खूब चाहते हैं पर उन्हें परंपरागत मीडिया में उतना स्पेस नहीं मिल पाता सो वो अपनी भड़ास कई ब्लागों पर निकालते रहते हैं। इनके जरिए वे समकालीन समाज की विसंगतियों, ट्रेंड, हलचलों को उजागर कर भविष्य के लिहाज से दशा-दिशा की कल्पना करते हैं।
--कुछ मीडियाकर्मी ऐसे हैं जो अपने हेक्टिक रुटीन में जो कुछ आफिसियल करते हैं, उसके बाद अनआफिसियल इतना कुछ मन में भरा रहता है कि उसे अपने ब्लाग पर बढ़िया तरीके से पब्लिश करते हैं।
--ढेर सारे गैर-मीडियाकर्मी ब्लागर अपनी पृष्ठभूमि और जेंडर के हिसाब से अपने अनुभवों को शब्दों में डालकर अपने ब्लाग पर पोस्ट डालते रहते हैं। इनमें महिला ब्लागरों को लीजिए तो वो महिलाओं से जुड़ी जीवन स्थितियों को लगातार अपने ब्लाग पर फोकस में रखती हैं और इस मर्दवादी समाज में महिलाओं के आगे बढ़ने में आने वाली दिक्कतों को उजागर करती रहती हैं। कुल मिलाकर अपनी भड़ास को वो एक मंच प्रदान करने में सफल होती हैं।


आप ब्लागिंग के वर्तमान ट्रेंड को देखेंगे तो इसे लंबे समय से दबी छिपी भावनाओँ, सोच व अभिव्यक्ति को ग्लोबल प्लेटफार्म मिलते ही इसके एकदम से निकल पड़ने का दौर कह सकते हैं। मतलब, भड़ास काल।
ब्लागर पोजीशन लें, लाइन-लेंथ तय करें
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लेकिन यह भड़ास काल लंबा नहीं चल सकता। आखिर जल्द ही वो दौर आएगा जब सभी ब्लागरों को अपनी अपनी लाइन ले लेनी होगी वरना उनके विलुप्त हो जाने या अलगाव में पड़ जाने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। और कुछ ब्लागरों ने बेहद व्यवस्थित तरीके से इस काम को करना भी शुरू कर दिया है। उदाहरण के तौर पर...कमल शर्मा का वाह मनी नामक ब्लाग सिर्फ और सिर्फ आर्थिक मुद्दों व निजी लाभ से जुड़े विषयों को उठाता है। इस ब्लाग का अपना एक पाठक वर्ग है। इस ब्लाग पर न तो भड़ास होती है और न सनसनी। यहां जानकारियां दी जाती हैं जिससे आपका भला हो। इसी तरह मोहल्ला ब्लाग खुद को एक ऐसे लोकतांत्रिक वामपंथी रुझान वाले व साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक व राजनीतिक सवालों के जवाब तलाशने वाले ब्लाग के रूप में विकसित कर रहा है जिसका अपना एक पाठक वर्ग है। इसी तरह आलोक पुराणिक अपने ब्लाग को व्यंग्य के ब्लाग के रूप में डेवलप करने में सफल रहे हैं और उनका अपना एक पाठक वर्ग है। जिसे व्यंग्य पढ़ना होगा वह आलोक जी के यहां जाएगा। ब्लागों से संबंधित रपट पढ़नी है तो आपको नीलिमा के ब्लाग पर जाना होगा। ऐसे ढेरों नाम लिये जा सकते हैं लेकिन मैं यहां केवल उदाहरण देने के लिए बात कर रहा हूं। इसमें आप भड़ास ब्लाग का भी जिक्र कर सकते हैं जो हिंदी मीडियाकर्मियों का कम्युनिटी ब्लाग है और हिंदी मीडियाकर्मियों का अनआफिसियल एक्सप्रेशन है। इसका अपना एक पाठक वर्ग है।
ब्लागिंग के भड़ास काल के रोमांच में बंधे हिंदी ब्लागरों को जितनी जल्दी हो अपनी पोजीशन ले लेनी चाहिए। उन्हें खुद को स्पेशलाइज करना चाहिए। अगर कोई बकवास निकाल रहा है तो वह बकवास कब तक निकाल पायेगा, उसे सोचना चाहिए। अगर बकवास निकालने के फील्ड में स्पेशलाइज करने का इरादा है तो फिर भविष्य उज्जवल है।
सवाल है कि इससे क्या होगा?
आज जिस तरह किसी अच्छे से अच्छा या सनसनीखेज से सनसनीखेज ब्लाग पोस्ट के पाठक अधिकतम 300 से 500 हो पाते हैं, उससे हिंदी ब्लागिंग का भला नहीं होने वाला। यह आंकड़ा निराश करता है। किसी भी ब्लाग पर रोज आने वालों यूजर्स व पाठकों की संख्या दस हजार से लेकर पचास हजार तक और फिर एक लाख तक होनी चाहिए। तभी आप ब्लागिंग को सफल कर सकते हैं। तभी हिंदी ब्लागिंग को बचाया जा सकता है वरना इसे नानसीरियस तरीके से छोटी मोटी तकनीकी चीज के रूप में ही लिया जाता रहेगा।
ब्लाग आधुनिकतम मीडिया माध्यम
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ब्लागिंग के भविष्य को लेकर कई बिंब उभरते हैं। पहला तो यह कि यह सबसे आधुनिकतम मीडिया माध्यम बनेगा। वो जो खबरें दबा दी जाती थीं, वो जो खबरें न दिखाई जाती थीं, वो जो बातें न सुनाई जाती थीं, उन सभी को ब्लाग छापेगा, दिखाएगा और सुनाएगा। तो यह मीडिया को वो नया माध्यम है जो प्रिंट और टीवी को चिकोटी काटेगा। प्रिंट और टीवी के मठाधीश जो खबर बनाने व दिखाने में खेल करते हैं, पत्रकारों की नियुक्ति व हटाने में राजनीति करते हैं, ऐसे सभी मठाधीशों पर भी खबरें बनेंगी और छपेंगी, ब्लाग माध्यमों पर। पद्मनाभ मिश्र का मेरा बकवास इसी ट्रेंड को दिखाता है। भड़ास ब्लाग पर डाली जाने वाली कई रचनाएं इसी प्रवृत्ति को बयान करती हैं। जो चीज आफलाइन मीडिया माध्यमों मसलन टीवी और अखबार और मैग्जीन में है, उसे आप ब्लाग पर लायेंगे तो वो उतना हिट न होगा क्योंकि उन माध्यमों ने उसी को आनलाइन भी बनाया हुआ है। अगर एक अखबार है तो उसकी एक आनलाइन साइट भी है। खबरें अखबार में भी हैं और खबरें उसकी आनलाइन साइट पर भी हैं। तो आप इसी तरह का ब्लाग बना लेंगे, न्यूज या खबरों से जुड़ा, तो वो नहीं चलने वाला।
हिंदी ब्लागिंग से बनेंगी नई सक्सेस स्टोरीज
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हिंदी ब्लागिंग में वो चीज सफल होगी जो न तो अब तक आनलाइन में रही है और न ही आफलाइन में। मजेदार ये है कि चूंकि हिंदी ब्लागिंग के शुरु होने का दौर ही आनलाइन में हिंदी वेबसाइट्स के शुरू होने का दौर है तो हर ब्लागर को खुद के ब्गाग के साथ साथ हिंदी में आनलाइन मार्केट में खुद को स्थापित करने व इससे रेवेन्यू जनरेट करने के बारे में सोचना व प्लान करना चाहिए। जैसे, मेरा खुद का एक सपना है कि जिस दिन भड़ास ब्लाग के दस हजार सदस्य हो जायेंगे उस दिन हम लोग वाकई एक रेवेन्यू जनरेशन माडल को शुरू करेंगे और उसका लाभ सभी सदस्यों को मिलेग। यह कैसे और किस तरह होगा, इस पर लगातार सोचा जा रहा है। ऐसे ही ढेरों काम हैं, जो अभी किए नहीं गए हैं और जो करेगा वो जीतेगा। जीतेगा इसलिए क्योंकि दरअसल अभी सामने कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं है इसलिए अखाड़े में आप उतरेंगे तो आपको ही विजेता घोषित किया जाएगा।
बात हो रही थी हिंदी ब्लागिंग की। तो साथियों, ब्लागिंग के इस भड़ास काल के, मेरे हिसाब से इस साल भी चलते रहने की उम्मीद है और अगले साल भी चलेगा। और इन दो सालों में ब्लागरों की संख्या आज की संख्या से पांच गुना ज्यादा हो जाएगी। और तब हर अच्छी पोस्ट को पढ़ने वालों की संख्या हजार से पांच हजार तक पहुंच सकती है। इसमें थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है। इन दो वर्षों में कई ब्लाग खुद को बेहद प्रोफेशनली मैनेज करेंगे और बड़ा नाम बनेंगे। साथ में दाम भी पाएंगे।
तो आइए, हिंदी ब्लागिंग के अगुवा साथियों, भड़ास काल से निकलने के लिए खुद को स्पेशलाइज और आर्गेनाइज करें। इसके जरिए हम खुद का और खुद के ब्लाग का काम, आनलाइन माध्यम में हिंदी भाषा और हिंदी वालों का ज्यादा भला करेंगे। अगर हम ऐसा करने में असफल रहे तो बड़ी कंपनियां थोड़े देर से ही आएंगी और हर उन आइडियाज पर जिस पर काम करना बाकी है, काम शुरू कर देंगी। फिर हम हिंदी वाले सदा की तरह उनके एक यूजर या रीडर बनकर रह जाएंगे, मैदान से बाहर, हाशिए पर खड़ा होकर ताली बजाते हुए तमाशे देखने वाले। और खेल खत्म होने पर कुछ लुटा पिटा सा एहसास करते हुए घर जाने वाले। मेरे खयाल से आनलाइन में हिंदी कें मार्केट पर हिंदी ब्लागरों की प्रोफेशनल निगाह होनी चाहिए और आगे जो ब्लागर मीट हों उनमें एक दूसरी की प्रशंसा या निंदा की बजाय एक दूसरे के साथ मिलकर आनलाइन हिंदी मार्केट को ट्रैप करने की रणनीति पर बातचीत होनी चाहिए। एक तरह के गुणधर्म वाले ब्लागरों को मिलकर अपने ब्लाग संचालित करने के बारे में सोचना चाहिए।
और आज नहीं तो कल ब्लागरों को करना होगा। आज ये काम आप अपनी दूरदर्शी निगाह के कारण कर सकते हैं, कल ये काम आपको मजबूरी में करना होगा क्योंकि आपको खाने के लिए बड़े शिकारी सामने मुंह बाये दिखेंगे तो आपको डर के मारे आपसी यूनिटी कायम करनी होगी।
मुझे लगता है इस मुद्दे पर हम सभी ब्लागरों को विचार विमर्श करते रहना चाहिए।
इस सीरियस भड़ास को सीरियस तरीके से लेने की जरूरत है...:)

Tuesday, January 8, 2008

चिट्ठाई हिंदी- उच्‍छवास से मालमत्‍ता

हिंदी- चिट्ठाकारिता का जो छोटा -सा इतिहास आख्‍यान है वह हिंदी पट्टी की राजनीति, राजभाषा की सरकार नीति तथा हिंदीखोरों, हिंदीबाजों की गिद्धनीति से मुक्‍त है- इससे वह पतित - पावन तो नहीं हो जाता लेकिन हिंदी -लेखन की बाकी विधाओं से विशिष्‍ट अवश्‍य हो जाता है। यहॉं की हिंदी - अंग्रेजी विरोध पर नहीं खड़ी है- अधिकांश चिट्ठाकार अंगेजी में लिखने में समर्थ हैं कुछ अंगेजी में चिट्ठाकारी करते भी हैं, सुनील दीपक तो अंगेजी, हिंदी के साथ साथ इतालवी में ब्‍लॉग लिखते हैं। इसी तरह शुएब उर्दू में चिट्ठाकारी करते हुए हिंदी चिट्ठाकार हैं, छत्‍तीसगढ़ी, हरियाणवी, मैथिली की चिट्ठाकारी के साथ - साथ हिंदी चिट्ठाकारी करने वाले चिट्ठाकार भी हैं। दूसरी खास बात संस्‍कृत के पाश से मुक्ति है, एक स्‍वयंसेवक चिट्ठे ‘लोकमंच’ को छोड़ दिया जाए तो कोई ‘देववाणी’ की आराधना के पचड़े में नहीं पड़ता। यह विविधता और आजादी हिंदी चिट्ठाकारी का अपना मौलिक मुहावरा गढ़ती है। इसमें गाली है, सुहाली है, नया है, पुराना है, फिल्‍मी है, जिगरी है, गली है, मोहल्‍ला है, इन सबकी पंचमेल खिचड़ी ही नहीं है वरन एकदम नए व्‍यंजन हैं। चिट्ठाकार भाषाई मानकों के फेर में नहीं पड़ता वरन उसे निरंतर प्रयोग से मांजता और निथारता है।

भाषा के स्‍तर पर जिस विधा को चिट्ठाकारी के सबसे निकट मान सकते हैं वह शायद नुक्‍कड़ नाटक है। व्‍यंग्‍य, नुक्‍कड़ता, बेबाकी, अनौपचारिकता, भदेसपन, ठेठ स्‍थानीयता ये सब कुछ नुककड़ नाटकों की ही तरह चिट्ठों में भी मिलता है। अंतर बस इतना है कि ये नुक्‍कड़ और गलियॉं चूंकि देश ही नहीं विदेश तक में, अलग-अलग टाईम जोन में, अलग – अलग स्‍पेस में मौजूद हैं इसलिए इनमें स्‍थानीयता का रंग ग्‍लोबल है। प्रमोद का एक वाक्‍य-

भावों के ऐसे उच्‍छावास के बाद साहित्‍य और सिनेमा दोनों में प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से लिपट-चिपट जाते हैं, गले में बांह डालकर फुसफुसाते हुए दूसरे बड़े कारनामों की पूर्व पीठिका बनाने लगते हैं. मैं भी उसी परंपरा में स्‍नान करने को उद्धत हो रहा था, लेकिन परिस्थिति, साली, अनुकूल नहीं हो रही थी! नायिका तीन से छै कदम की दूरी पर चली गई और नौ साल का एक बेलग्रादी तस्‍कर लौंडा हमारे बीच अपने मर्चेंडाइस का मिनी स्‍टॉल लगाकर प्रेमबाधा बनने लगा. इसके पहले कि मैं हरकत में आऊं, रेहाना को वही रिझा रहा था. चीनी सिगरेट, सैंडल और ब्‍लॉग रिट्रीव करने के सॉफ्टवेयर दिखा रहा था. रेहाना ने गहरी उदासी से एक नज़र उसके माल-मत्‍ते पर डाली, फिर लौंडे के भूरे बालों में हाथ फेरकर नज़रें फेर लीं. मगर लौंडा उसमें संभावित ग्राहक देखकर चिपका रहा, तेजी से माल का रेट डाऊन करके मोलभाव करने लगा [i]

उच्‍छवास से रिट्रीव, माल मत्‍ता सब एक ही पेराग्राफ में। कोई संक्रमण पद नहीं। या स्‍पैक्‍ट्रम के दूसरे छोर पर आशीष की भाषा-

अइयो अम चेन्नई से आशीष आज चिठठा चर्चा कर रहा है जे। अमारा हिन्दी वोतना अच्छा नई है जे। वो तो अम अमना मेल देख रहा था जे , फुरसतिया जे अमको बोला कि तुम काल का चिठ्ठा चर्चा करना। अम अब बचके किदर जाता। एक बार पहले बी उनने अमको पकड़ा था जे,अम उस दिन बाम्बे बाग गया था। इस बार अमारे पास कोई चान्स नई था जे और अम ये चिठ्ठा चार्चा कर रहा है जे।[ii]

पर इसका आशय यह कतई नहीं कि यह अनगढ़पन हिंदी चिट्ठाकारी की विवशता है, यह तो इस विधा का अपना तेवर है जो दुनिया की हर भाषा की चिट्ठाकारी में दिखाई देता है। हिंदी ने शब्‍द व रचना के स्‍तर पर एक स्‍वतंत्र चिट्ठाई भाषा रची है। जो फुरसतिया, समीर, सुनील दीपक, तरूण, मसिजीवी, नोटपैड, प्रमोद , धुरविरोधी में साफ दिखाई देती है। फुरसतिया के चिटृठे से एक बानगी-

हमें लिखना है फटे जूते की व्यथा-कथा। व्यथा-कथा मतलब रोना-गाना। आंसू पीते हुये हिचकियां लेते हुये अपनी रामकहानी कहना। हाय हम इत्ते खबसूरत थे लोग हम पर फिदा रहते थे और अब देखो चलते-चलते हमारा मुंह भारतीय बल्लेबाजी की दरार का कैसा खुल गया है। लुटने पिटने का अहसास, ठोकरों के दर्द की दास्तान बताना। मतलब अपने दर्द को गौरवान्वित करना। मुक्तिबोध के शब्दों में दुखों के दागों को तमगों सा पहनने का प्रयास करना। यह रुदाली तो हमसे न सधेगी भाई।

फटा हुआ जूता मतलब चला हुआ जूता। जो जूता चलेगा वही फटेगा। शो केस में रखे जूते बेकार हो जाते हैं , सड़ सकते हैं लेकिन फटते नहीं। फटने के लिये चलना जरूरी होता है। फटेगा वही जिसने राहों के संघर्ष झेले होंगे। [iii]

वैसे इसका अर्थ यह कतई नहीं कि चिट्ठाकारी की भाषा की विकास - यात्रा में सजगता नदारद है। सजगतावादी भी हैं और अक्‍सर आगाह करते रहते , प्रियंकर की मसिजीवी पर टिप्‍पणी पर गौर करें-

आपके लिये एक और सूचना है कि 'गद्य' पुल्लिंग है अतः आपकी टिप्पणी में गद्य के पहले इकारांत विशेषण 'कवितामयी' और 'विषादमयी' थोड़े अटपटे लग रहे हैं . आशा है सुधार करेंगे. आप हिंदी के पीएच.डी. हैं इसलिए लिख रहा हूं वरना ऐसे सौ दोष माफ़.
हर तरह की भाषा का अपना व्यवहार क्षेत्र (डोमेन)होता है . चाहे वह अखाड़े की भाषा हो,कारखाने की भाषा हो,कार्यालय की भाषा हो या फिर साहित्य की भाषा . आतंकवादियों के प्रति क्रोध को 'ठुमरी' और 'निर्गुण' के माध्यम से अभिव्यक्त करना अभी हिंदी जगत में नया है इसलिये थोड़ा अटपटा लगा . वरना भैये जिसके जो जी में आये करे अपन को क्या . हां!, लगता है अब इस नई विधा के जन्म पर सोहर गाने के दिन आ गये हैं.[iv]

यह सजगता भले ही चिट्ठाकारी में सर्वत्र विद्यमान तत्‍व नहीं है किंतु जैसे - जैसे तकनीक- विशेषज्ञ चिट्ठाकारों के साथ नए चिट्ठाकार जुडने लगे हैं, भाषा को लेकर सजगता बढ़ी है ! ब्‍लॉगिंग एक जनसंचार माध्‍यम है और टी.आर.पी. की तर्ज पर हिट यहॉं की मुद्रा है इसलिए बोझिल भाषा यहॉं नहीं सधेगी।

चिट्ठाकारी का भविष्‍य

किसी भी नए संचार माध्‍यम का स्‍वागत पहले कौतुहल फिर नकार से होता है और जल्‍द ही उसकी जगह भविष्‍य को लेकर खड़े किए गए प्रश्‍नचिह्न ले लेते हैं। यही चिट्ठाकारी के साथ भी हो रहा है। इसके भविष्‍य को लेकर अटकलबाजी व गंभीर मनन दोनों जारी हैं। एक बात जिसे लेकर आम सहमति है वह है मात्रात्‍मक विस्‍तार- यह् आसन्‍न भविष्‍य है। आज हम 700 चिट्ठों की बात कर रहे हैं कल 7000 की करेंगे और परसों...। आज एक नारद है कल बीस होंगे। लेकिन प्रथमत: और अंतत: यह व्‍यक्तिगत ई-प्रकाशन ही रहेगा, इसके साथ ध्‍वनि (पॉडक‍सस्टिंग) और दृश्‍य ( यू ट्यूब) और अधिक जुड़ेंगे पर पठ्य का महत्‍व बना रहेगा। लेकिन जिस बात को समझना असवश्‍यक है वह यह कि मात्रात्‍मक विस्‍तार और प्रौद्योगिकीय प्रगति इसमें गुणात्‍मक बदलाव नहीं लाएगी। सौभाग्‍य से यह आम हिंदीजन का ही माध्‍यम रहेगा और इसकी विशेषता-- अनगढ़पन, साधारणता, जुड़ाव और पहचान से ही चिट्ठाकारी परिभाषित होती रहेगी। फ़ुरसतिया ने चिट्ठाकारी के भविष्‍य पर अपनी राय व्‍यक्‍त करते हुए कहा-

विश्‍वविद्यालयी एप्रोच से चिटठाकारी का भला संभव नहीं, ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ मान लीजिए। बाकी रही आचार संहिता की बात तो कितनी भी बना लो ये तो नूह्हें चाल्‍लेगी। आगे भविष्य क्या तय होगा उसका मुझे नहीं पता लेकिन फिलहाल अभी यह लगता है कि अनगड़ता ,अनौपचारिकता और अल्हड़ता ब्लागिंग के खास पहलू हैं। एनडीटीवी वाले साथी अभी ब्लाग की नब्ज नहीं समझ पाये हैं। वे ज्ञानपीड़ित हैं और कुछ-कुछ 'मोहल्ला मंडूक' भी।
यह आप समझ लें कि कोई भी नयी दुनिया बनेगी लेकिन ब्लागिंग की ताकत, आकर्षण और सौंदर्य इसका अनगड़पन और अनौपचारिक गर्मजोशी रहेगी। ऐसा मैं अपने दो साल के अनुभव से कहता हूं। मेरे पास तमाम कालजयी साहित्य अनपढ़ा है लेकिन उसको पढ़ना स्थगित करके मैं यहां तमाम ब्लागर की उन रचनाऒं को पढ़ने के लिये लपकता हूं जिनमें तमाम वर्तनी की भी अशुद्धियां हैं, भाव भी ऐं-वैं टाइप हों शायद लेकिन जुड़ाव का एहसास सब कुछ पढ़वाता है। यह अहसास ब्लागिंग की सबसे बड़ी ताकत है। यह मेरा मानना है। अगर बहुमत इसे नकारता भी है तब भी मैं अपने इस विश्वास के साथ ही चिट्ठाजगत से जुड़ा रहना चाहूंगा! :) [v]

आमीन।।।


[i] प्रमोद सिंह, ज़माने की बेवफ़ाइयां और कुली नंबर वन की एंट्री http://azdak.blogspot.com/2007/04/blog-post_23.html

[ii] आशीष, ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर, http://chitthacharcha.blogspot.com/2007/03/blog-post_18.html

[iii] फुरसतिया, जूते का चरित्र साम्यवादी होता है, http://hindini.com/fursatiya/?p=265

[iv] प्रियंकर, का करूं सजनी..... आए ना बालम......... ]http://vadsamvad.blogspot.com/2007/02/blog-post_19.html

[v] फुरसतिया, आइए रचें हिंदी का मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र, http://masijeevi.blogspot.com/2007/03/blog-post_13.html

ये अनाम, बेनामों की दुनिया है...नामवरों की नहीं

चिट्ठाकारी की प्रकृति, लेखन में एक बहुत ही रोचक स्थिति उत्‍पन्‍न करती है। अनौपचारिकता इस लेखन की खास बात है- यू.एस.पी. है इस दुनिया का। इसलिए इस लेखन में लेखक की शख्सियत उसके एक- एक शब्‍द से झांकती है लेकिन उलटबांसी यह है कि इस माध्‍यम में लेखक के व्‍यक्तित्‍व को उसके लेखन से बिल्‍कुल अलगाकर देखे जाने की परिपाटी है। यहॉं अधिकांश लेखन ‘बंगमहिला’ की तर्ज पर होता है पता नही कौन हैं? कैसी हैं ? दरअसल बेनाम चिट्ठाकारी न केवल स्‍वीकृत है वरन अधिकांश इंटरनेट सुरक्षा के विशेषज्ञ यह राय देते हैं कि चिट्ठाकार को अपनी असल पहचान के तत्‍वों मसलन सही नाम, सही पता, ईमेल पता, फोन नंबर आदि को सुरक्षा के हित में सार्वजनिक करने से परहेज करना चाहिए।

दरअसल जब एक चिट्ठाकार चिट्ठा आरंभ करता है तो वह एक नाम चुनता है और यह वाकई चुनाव होता है- आप अपना नाम भी चुन सकते हैं जैसे कि इन पंक्ति‍यों की लेखक ने चुना है और आप कोई उपलब्‍ध काल्‍पनिक नाम भी चुन सकते हैं ! इसी तरह आप उम्र, लिंग, शहर तथा स्‍व - परिचय भी लिखते हैं इसे प्रोफाइल कहा जाता है। चिट्ठाकार अपने लिए क्‍या प्रोफाइल चुनते हैं, क्‍यों चुनते हैं इस सब पर बाकायदा मनोविश्‍लेषण में रुचि रखने वाले एक शोध - प्रबंध लिख सकते हैं! पर यहॉं सिर्फ इतना दर्ज है कि छापे की दुनिया के बरअक्‍स इस चिट्ठाकारी में चिट्ठाकार की शख्सियत आभासी होती है और तो और वह न केवल कभी- भी अपनी प्रोफाइल को बदल सकता है वरन चाहे तो बिल्‍कुल मिटाकर एक नई प्रोफाइल बना सकता है जो पिछली से बिल्‍कुल अलग हो। चिट्ठाकार एक साथ दो या अधिक प्रोफाइल भी रख सकता हैं और जितना उसमें बूता हो उतने चिट्ठे लिख सकता है। चिट्ठाकार का व्‍यक्तित्‍व इस बात से कतई तय नहीं होता कि वह असल जिंदगी में क्‍या है वरन इस बात से होता है कि वह क्‍या लिखता है और अपने बारे में क्‍या राय तैयार करता है। मसलन देखिए धुरविरोधी कैसे अपना रूप खड़ा करते हैं-

मेरा नाम जे.एल.सोनारे है, मैं मुम्बई, गोकुलधाम के साईंबाबा काम्प्लेक्स में रहता हूं, उम्र उनतीस साल, एक फिल्म प्रोडक्शन कंम्पनी में थर्ड अस्सिस्टेंट हूं, मतलब, चपरासी जैसा काम. मेरे काम्प्लेक्स में ही जबलपुर वाले रघुवीर यादव रहते हैं. आपने इनकी फिल्में जरूर देखी होंगी. दद्दा रघुबीर यादव हमें ढेर सारी कहानियां सुनाते रहते है मसलन, भेड़ाघाट के बारे में या अपनी पहली हीरोइन (आज की मशहूर लेखक) अरुन्धती राय के बारे में, आदि आदि. मेरे वन रूम सेट के सामने सुनीता फाल्के नाम की लड़की रहती है जो किसी ट्रेवल एजेन्सी में काम करती है और अक्सर मुझे देखकर मुस्कुराते हुये ओ मेरे सोनारे, सोनारे, सोनारे गुनगुनाने लगती है. मेरी हिम्मत कभी भी उससे बात करने की नहीं हुई. वो मेरे से ढाई गुना कमाती है, मेरा उसका क्या मुकाबला?[i]

किंतु इसके ठीक अगली ही पंक्ति में कहते हैं-

बताईये कैसा लगा मेरा परिचय? यदि मैं इस प्रकार आता तो आपको कोई शिकायत नहीं होती. क्या आप मेरा पुलिस वेरीफिकेशन कराते? ये सब झूठ है. मैं जे एल सोनारे नहीं हू, न मुम्बई में रहता हूं. मैं ब्लाग की दुनिया में धुरविरोधी के नाम से हूं, यही मेरा परिचय है. मैं मसिजीवी भी नहीं हूं और वो भी नहीं हूं जिसके होने का कुछ लोगों को पक्का भरोसा है. [ii]

यानि चिट्ठाकारी की दुनिया में चिट्ठाकार के व्‍यक्तित्‍व पर एक झीना आवरण रहता है तथा वह वही होता है जो वह कहता है कि वह है।

किंतु हिंदी- लेखन व हिंदी - पठन के जो संस्‍कार हमारी हिंदी - आलोचना ने अब तक विकसित किए हैं उनके कारण इसे पचा पाना हिंदी चिट्ठाकारी के लिए काफी कठिन हो रहा है। हाल में ‘मुखौटा विवाद’ ने हिंदी - चिट्ठाकारी में काफी ज्‍वार भाटे पैदा किए। हुआ यह कि एक पुराने चिट्ठाकार जो मसिजीवी नाम से चिट्ठाकारिता करते हैं ने ‘....मुझे मुखौटा आजाद करता है शीर्षक एक पोस्‍ट लिखी और यह तर्क दिया कि चिट्ठाकारिता की दुनिया में लेखक यदि मुखौटा लगाकर बात कहे तो वह संरचनात्मक दबाब से मुक्‍त होकर लिख पाता है क्‍योंकि उसे पॉलीटिकल करेक्‍टनेस, छवि आदि की परवाह किए बिना लिखना होता है। मसिजीवी का कहना था -

मुखौटों के चेहरे पर लगते ही आप बस एक मुखौटा हो जाते हैं। लोग इस दुनिया में (चिट्ठाकारी में) इसलिए जाते हैं कि ये मुखौटे इस दुनिया के वासियों को आजाद करते हैं। आप इन मुखौटों को पहनकर वह सब कर सकते हैं जो करना चाहते थे पर कर नहीं पाते थे और अक्‍सर दिखाते थे कि आप ऐसी कोई चाहत नहीं रखते, मसलन चलते चलते आपका अक्‍सर मन करता था कि चीख कर कहें कि आप खुश नहीं हैं, आपका पति आपको पीटता है...या आप अपनी पत्‍नी को पीटते है...लेकिन जाहिर है ऐसा नहीं कर पाते थे। [iii]

आगे चिट्ठाकारों से यह आग्रह भी किया था कि लोगों के मुखौटों के पीछे झांकना छोंड़ें क्‍योंकि ऐसा करने से चिट्ठाकारी का उद्देश्‍य ही खत्‍म हो जाएगा।

खतरा यह है कि यदि आप इसे (चिट्ठाकारी को) वाकई मुखौटों से मुक्‍त दुनिया बना देंगें तो ये दुनिया बाहर की रीयलदुनिया जैसी ही बन जाएगी नकली और पाखंड से भरी। आलोचक, धुरविरोधी, मसिजीवी ही नहीं वे भी जो अपने नामों से चिट्ठाकारी करते हैं एक झीना मुखौटा पहनते हैं जो चिट्ठाकारी की जान है। उसे मत नोचो---ये हमें मुक्‍त करता है।[iv]

इस पोस्‍ट ने कई कड़ी प्रतिक्रियाओं को जन्‍म दिया। कहा गया कि तर्क व हिम्‍मत की कमी वालों को ही मुखौटों की जरूरत पड़ती है। कुछ समर्थन के स्‍वर भी आए जैसे धुरविरोधी ने कहा –

जिसे आप रीयल जिन्दगी कहते हैं, उसमे मुझे न चाहते हुये भी लोगों को अच्छा अच्छा बोलना पड़ता है. सोचना होता है कि लोग क्या कहेंगे. एक मुस्कुराहट का मुखौटा ओढ़ना पड़ता है. वो मेरा असली रूप नहीं है.
लेकिन धुरविरोधी बिना मेरे नाम का मुखौटा ओड़े हुये मेरा असली रूप है. यह मेरा वह रूप है, जैसा मैं हूं. मेरे असली नाम के मुखौटे को उतार कर मैं एकदम आज़ाद हो जाता हूं, बिल्कुल मसिजीवी की तरह.
इस दौरान हमारी आपस में असहमतियां या सहमतियां हो सकती हैं. संजयजी, मेरे प्रलाप में तर्क भी हैं और हिम्मत भी. क्या हम असहमति एवं सहमति दोनों के बीच में नहीं जी सकते?
मुझे तो अब नकली और पाखंड दूर यह दुनियां ही पसंद है.[v]

उसके बाद ‘धुरविरोधी ने ‘कौन है धुरविरोधी’ शीर्षक से पोस्‍ट लिखी जबकि ‘ये मसिजीवी क्‍या है’ पोस्‍ट पहले ही आ चुकी थी, घुघुती बासुती ने भी ‘घुघुती बासुती क्‍या है’ पोस्‍ट पहले ही लिख दी थी। इन पोस्‍टों मे इन चिट्ठाकारों ने अपनी पहचान बताने के स्‍थान पर यह बताया था कि चिट्ठाकारी पहचान के वमन की जगह नहीं वरन पहचान के निर्माण की जगह है।

-(धुरविरोधी के लिंक्‍स डेड हैं क्‍योंकि उन्‍होंने अपना चिट्ठा मिटा दिया है)


[i] धुरविरोधी, धुरविरोधी कौन है,http://dhurvirodhi.wordpress.com/2007/03/16/o-mere-sonare/

[ii]धुरविरोधी, धुरविरोधी कौन है, http://dhurvirodhi.wordpress.com/2007/03/16/o-mere-sonare/

[iii]मसिजीवी,मुझे मुखौटा आजाद करता है, http://masijeevi.blogspot.com/2007/03/blog-post_15.html

[iv]मसिजीवी,मुझे मुखौटा आजाद करता है, http://masijeevi.blogspot.com/2007/03/blog-post_15.html

[v] धुरविरोधी, धुरविरोधी कौन है,http://dhurvirodhi.wordpress.com/2007/03/16/o-mere-sonare/