Wednesday, August 15, 2007

टैक्‍नोराटी के मोर्चे पर चिट्ठाजगत ने नारद को पछाड़ा

विस्‍तृत विश्‍लेषण पहले ही किया जा चुका है किंतु अंतर्जाल पर हालात इतनी तेजी से बदलते हैं कि क्‍या कहें। 29 जुलाई को टैक्‍नोराटी पर चिट्ठाजगत 46000 के लगभग था और नारद 33662 पर। आज देखा तो एक चमत्‍कारिक नजारा दिखा आप देखें-

टैक्‍नोराटी पर नारद

 

टैक्‍नोराटी पर चिट्ठाजगत

 

जी दोनों ठीक एक ही पायदान पर मिल रहे हैं। जब तक आप देखें हो सकता है कि स्थिति फिर बदल गई हो पर फिलहाल की स्थिति सामने रख दी है। हमने पछाड़ा शब्‍द इस्‍तेमाल किया मानो कोई रेस हो रही हो- जबकि कहा जा सकता है कि भई ऐसा कुछ नहीं है पर फिर भी एक प्रतियोगिता तो है और होनी चाहिए- वैसे रैंक बराबर हैं सिर्फ इसलिए कि टैक्‍नोराटी के गणितीय समीकरण जो रैंक आंकते हैं वे इतिहास, ऐतिहासिक महत्‍व जैसे गैर गणितीय घटकों के लिए कोई मूल्‍य नहीं रखते। खैर हमने तो वास्‍तविक स्थिति आपके सामने रखी, बाकी आप विचारें।

Friday, August 10, 2007

बजरबट्टू पर भिड़ गये ब्लॉग के बहादुर

कथादेश में इंटरनेट के मोहल्‍ले की पॉंचवीं किस्‍त आज हाथ लगी। अविनाश ने इस माह शब्‍दों के संग्राम में जुटे ब्‍लॉग बहादुरों पर अपनी राय रखी है। लीजिए हाजिर है-

बजरबट्टू पर भिड़ गये ब्लॉग के बहादुर

अविनाश

हिंदी में शब्दों की खोज लगभग खत़्म हो गयी है. लेखक इस ज़रूरत से उठ गये हैं कि उनकी अभिव्यक्ति के पन्नों को नये शब्द कुछ रोशनी बिखेर सकते हैं. बल्कि जाने हुए शब्दों के जरिये कहानी और कविता के सीमित शिल्प को सरल समय का आईना कह कर वे नये शब्दों की ज़रूरत को खारिज़ तक कर देते हैं. लेकिन ब्लॉग्स में भूले हुए शब्दों को खोजने और कई मौजूदा शब्दों की जड़ों तक पहुंचने का काम कुछ लोग कायदे से कर रहे हैं.

अजित वाडनेकर ऐसे ही एक सिपाही हैं, जो शब्दों का सफ़र (http://shabdavali.blogspot.com/)  नाम से अपना ब्लॉग चलाते हैं. उनके बारे में जानकारी अभय तिवारी के निर्मल आनंद से मिली. उन्होंने लिखा- पाया ब्लॉग जगत ने एक नया नगीना. आगे लिखा, 'वे हिंदी भाषा के संसार में एक मौलिक काम कर रहे हैं. शब्दों को उनके मूल में जाकर जांच परख रहे हैं. देशकाल और विभिन्न समाजों में उनकी यात्रा को खोल रहे हैं.` इतना काफी था हमें किसी ब्लॉग के बारे में उत्सुक करने के लिए. हम जब वहां पहुंचे, तो सचमुच ताज़ा रचनात्मकता की शीतल बूंदें वहां मोतियों की तरह बिखरी थीं.

ब्लॉग पर अपने सफ़र का आगा़ज़ वे कुछ इस तरह करते हैं, 'उत्पत्ति की तलाश में निकलें, तो शब्दों का बहुत ही दिलचस्प सफ़र सामने आता है. लाखों सालों में जैसे इंसान अपनी शक्ल बदली, सभ्यता के विकास के बाद से शब्दों ने भी अपने व्यवहार बदले. एक भाषा का शब्द दूसरी में गया और अरसे बाद एक तीसरी ही शक्ल में प्रचलित हुआ.`

आप अगर शब्दावली के पन्ने पलटेंगे, तो पाएंगे कि अजित वडनेकर ग्राम, गंवार और संग्राम के बीच के अंतर्संबंधों की व्याख्या कर रहे हैं. बगातुर और बघातुर से होते हुए बहादुर तक पहुंच रहे हैं. कुली से कुल की पहचान कर रहे हैं... और आरोही और रूहेलखंड के अर्थों में कुछ सम खोज रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि सब कुछ एकतरफा ही परोसा जा रहा है. हिंदी में शब्दों पर कम कश्मकश इधर देखने को मिले हैं, लेकिन ब्लॉग पर अजित वडनेकर से दो-दो हाथ करने वाले बहुतायत में हैं. एक का ज़िक्र यहां करते हैं.

बजरबट्टू के बारे में अजित वडनेकर ने लिखा, 'प्राचीनकाल में गुरुकुल के विद्यार्थी के लिए ही आमतौर पर वटु: या बटुक शब्द का प्रयोग किया जाता था. राजा-महाराजाओं और श्रीमंतों के यहां भी ऋषि-मुनियों के साथ ये वटु: जो उनके गुरुकुल में अध्ययन करते थे, जाते और दान पाते. बजरबट्टू भी बटुक से ही बना. बजरबट्टू आमतौर पर मूर्ख या बुद्धू को कहा जाता है. जिस शब्द में स्नेह-वात्सल्य जैसे अर्थ समये हों, उससे ही बने एक अन्य शब्द से तिरस्कार प्रकट करने वाले भाव कैसे जुड़ गये? आश्रमों में रहते हुए जो विद्यार्थी विद्याध्ययन के साथ-साथ ब्रह्मचर्यव्रत के सभी नियमों का कठोरता से पालन करता, उसे वज्रबटुक कहा जाने लगा. जाहिर है वज्र यानी कठोर और बटुक मतलब ब्रह्मचारी/विद्यार्थी. ये ब्रह्मचारी अपने गुरु के निर्देशन में वज्रसाधना करते, इसलिए वज्रबटुक कहलाये. मगर सदियां बीतने पर जब गुरुकुल और आश्रम परंपरा का ह्रास होने लगा, तब बेचारे इन बटुकों की कठोर वज्रसाधना को भी समाज ने उपहास और तिरस्कार के नजरिये से देखना शुरू किया और अच्छा-खासा वज्रबटुक हो गया बजरबट्टू यानी मूर्ख.`

लेकिन अभय तिवारी ने बजरबट्टू के इस संधान पर संदेह किया. साफ है कि शब्दों के संधान को लेकर अलग अलग आग्रह और व्याख्याएं और सूचनाएं ब्लॉग पर तुरत-फुरत एक दूसरे तक पहुंच जाती हैं, और सफ़र को आगे जारी रखने में मदद मिलती है. अभय तिवारी ने प्रतिवाद किया, 'बजरबट्टू शब्द का लोकप्रिय प्रयोग बुरी नज़र से बचाने वाले एक पत्थर के अर्थ के बतौर है. रामशंकर शुक्ल 'रसाल` के भाषा शब्दकोश में भी बजरबट्टू का अर्थ है- एक पेड़ का बीज जिसे दृष्टिदोष से बचाने के लिए बच्चों को पहनाते हैं. बजर तो साफ़ साफ़ वज्र का तद्भव है, मगर बट्टू क्या है? क्या वट? क्या वटन? या वटक?`

और इस तरह एक नया भाषा विमर्श शुरू होता है, जिसमें हिंदी के कवि बोधिसत्व भी कूदते हैं. अपने ब्लॉग विनय पत्रिका में वे लिखते हैं, 'संदर्भ बजर का हो या बट्टू का, पर आप अपने बटुए को न भूलें. नहीं तो आप के हाथ से साबुन की बट्टी लेकर कोई और अपनी किस्मत चमकाएगा. फिर आप को बटुर (सिकुड़) कर रहना पड़ेगा और इसमें ठाकुर जी का बटोर (हजारी प्रसाद द्विवेदी) करने से भी कोई फायदा नहीं होगा. और आप धूल बटोरने में उम्र बिता देंगे. अच्छा हो कि यह बट्टा बन कर किसी भाव न गिरा दें जैसे कि आज कल कइयों का गिरा है.`

बजरबट्टू की इस पूरी बहस में कुल २९ बार लोग एक दूसरे से आपस में उलझे. अजित वडनेकर की पोस्ट पर चार टिप्पणियां दर्ज हैं, अभय तिवारी की पोस्ट पर बीस टिप्पणियां और बोधिसत्व की पोस्ट पर पांच टिप्पणियां दर्ज हैं. इस पूरी बहस में लंदन से अनामदास के साथ अनूप शुक्ला, इरफ़ान, अफलातून, काकेश, प्रियंकर, प्रमोद सिंह ने हिस्सा लिया. और भी कई नाम हैं, जिन्होंने अपनी बात रखी.

सवाल असहमतियों के लोकतांत्रिक गंठजोड़ का जितना है, उससे कहीं अधिक जिसके पास जितनी चीज़ें हैं, वे आपस में साझा कर रहे हैं. नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर जैसे अखब़ारों और दूरदर्शन, ज़ी न्यूज़, आजतक और स्टार न्यूज़ के साथ काम करते हुए अजित वडनेकर पिछले बाइस सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं. इतिहास और संस्कृति से उनका गहरा लगाव है, लेकिन ये अखब़ार आज जो उनका पेशा है, उसमें किसी काम का नहीं. लेकिन जो है, उसे समेटना है, बांटना है और ब्लॉग इसके लिए उन्हें सबसे सटीक माध्यम लगा.

ब्लॉग जगत की कुछ ताज़ा खब़र ये है कि हिंदी के दो और एग्रीगेटर लांच हुए हैं. एक चिट्ठाजगत डॉट इन और दूसरा ब्लॉगवाणी डॉट कॉम. ये एग्रीगेटर नारद के तानाशाही रवैये की उपज हैं. इससे साबित होता है कि अंतर्जाल का असंतोष रचनात्मक परिणामों के रूप में सामने आता है और वेब स्पेस में एकाधिकार की अवधारणा को खारिज़ करता है. एक खब़र ये भी है कि रवीश कुमार को हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बेहतर पत्रकारिता के लिए साल २००६-०७ का रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला है. कथादेश सम्मान के बाद इस साल ये उनकी दूसरी बड़ी उपलब्धि है.

Friday, August 3, 2007

अब एक एलेक्‍सा नजर कितने आदमी थे पर

चिट्ठा संसार में उथल पुथल मची है जो ऊपर से इतना दिखाई नहीं देती। हमने तीन एग्रीगेटरों के आंकड़ों पर विचार किया था और नतीजा दिया था कि अभी तो सब ठीक दिख रहा है- टेक्‍नॉराटी के हवाले से यह भी बताया कि नए एग्रीगेटरों पर गया ट्रेफिक सब नारद का नहीं है भई। बाद में चिट्ठाजगत के आंकड़े विपुल ने सामने रखे, अच्‍छा लगा। इस प्रकार की पारदर्शिता एक स्‍वस्‍थ परिघटना है, हांलॉंकि इस मामले में नारद बाजी मारता है क्‍योंकि उसके आंकड़े सर्वसुलभ हैं, बिल्‍कुल पारदर्शी, पर लगता है इसकी वजह है कि सबने उसे बिसरा दिया है :( - वरना क्‍या वजह है कि नारद के लॉग का आकार अभी तक 100 है जबकि स्‍टेटकांउटर ने अरसा हुआ, मुफ्त ग्राहकों के लिए लॉग का आकार 500 कर दिया था, इससे पूरी तस्‍वीर सामने आती है, 100 से तो केवल कुछ घंटों के ट्रेफिक का लॉग देता है बाकी के विषय में केवल समन्वित आंकड़े मिलते हैं। इस छोटे से काम में यानि 100 से 500 करने में 2-4 मिनट लगेंगे, कृपया ध्‍यान दें। खैर इसके बावजूद नारद की पारदर्शिता बाकी से बेहतर है क्‍योंकि आंकड़े रीयल टाईम में उपलब्‍ध हैं।


किंतु ट्रेफिक के आंकड़े केवल प्रदाता ही उपलब्‍ध नहीं कराता वरन एलेक्‍सा जैसे सेवा प्रदाता भी उपलब्‍ध कराते हैं। तो हमने पिछले तीन महीने के एलेक्‍सा आंकड़े चारों प्रमुख एग्रीगेटरों के लिए तुलना करते हुए लिए और देखें हमें क्‍या मिलता है-



ये ग्राफ पिछली मान्‍यता को कुछ कुछ बदलता है और यह दर्शाता है कि ब्‍लॉगवाणी प्रमुख एग्रीगेटर की तरह उभर रहा है जबकि नारद दक्षिणायन है। दरअसल एलेक्‍सा के अनुसार ट्रेफिक वाल्‍युम की दृष्टि से रैंक इस प्रकार हैं-

 

नारद                   1,60,514

ब्‍लॉगवाणी             3,75,551

हिंदी ब्‍लॉग्स          6,37,868

चिट्ठाजगत           9,08,770


नारद का रैंक अब भी सबसे अधिक है पर ये इनके डाटा के महीनों पुराने उपलब्‍ध होने के कारण है जो अन्‍य एग्रीगेटरों के पास नहीं है। यदि ऊपर वाले ग्राफ पर नजर डालें तो वह स्थान जहॉं ऊपर की ओर जाते ग्राफ नारद के नीचे जाते ग्राफ को काटते हैं- शोध प्रविधि की दृष्टि से यह ही क्रिटिकल प्‍वाईंट है।


किंतु इन आंकड़ों की एक सीमा है ये पेजलोड को एक संख्‍या मानकर विश्‍लेषित करते हैं जबकि वे मानवीय हस्‍तक्षेप हैं, अत: किसी भी मानविकी के शोध की तरह यहॉं भी मानना होगा कि वस्‍तुनिष्‍ठता से परे, व्‍यक्तिनिष्‍ठ शोध की अभी भी बहुत सी गुंजाइश है- इस मामले में निर्णायक पंक्ति लिखने का अभी समय नहीं आया है।


Sunday, July 29, 2007

आवाजाही के मोर्चे पर तीनों एग्रीगेटर

यह सुखद है कि हिंदी के चिट्ठासंसार ने खुद बहु-एग्रीगेटर स्थिति में परिपक्‍वता के साथ ढालना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों इसका प्रमाण प्रस्तुत करती कुछ घटनाएं दिखीं एक तो अहम घटना यह रही कि नारद, ब्‍लॉगवाणी व चिट्ठाजगत ने एक दूसरे का लिंक अपने मुखपृष्‍ठ पर दिया- अब उन लोगों के लिए जो एक से ज्‍यादा एग्रीगेटरों की सेवा लेते हैं ये काम आसान हो गया है। जैसा कि अरविंदजी का सर्वेक्षण बताता है कि 43 % चिट्ठापाठक दो या अधिक एग्रीगेटरों का इस्‍तेमाल करते हैं। यदि हम एग्रीगेटरों की तुलना सर्च इंजनों जैसे माध्‍यमों से करें तो स्‍पष्‍ट होता है कि इनकी आपसी प्रतियोगिता एक दूसरे के समर्थन की मांग करती है- अकसर सर्च इंजन ये सुविधा देते हैं कि आपके सर्च के लिए हमारी इंडेक्सिंग से यदि वांछनीय सामग्री न मिल रही हो तो आप अन्‍य सर्च इंजनों का इस्‍तेमाल कर सकते हैं- ये लीजिए लिंक। इसी क्रम में हिंदी के एग्रीगेटर भी एक दूसरे को समर्थन दे रहे हैं - यह परिपक्‍वता की निशानी है।


इसी संदर्भ में चंद और तथ्‍यात्‍मक बातें- जिन तीन एग्रीगेटरों की बात यहॉं की जा रही है उनके ट्रेफिक के आंकड़े भी हाल में हाथ लगे। नारद के तो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं ही- यहॉं पर और ये यह कहते हैं-



दूसरी ओर चिटृठाजगत के आवाजाही आंकड़े भी विपुल ने हाल में उपलब्‍ध कराए



- ब्‍लागवाणी को अभी और भी कम समय हुआ है तथा इस अवधि के आंकडें उपलब्‍ध तो न थे पर हमने शोध के उद्देश्‍य से मैथिलीजी से मांगे तो उन्‍होंने जो कुछ भी उनके पास थे सब विस्‍तारपूर्वक हमारे पास भेज दिए हैं। शोधधर्म के चलते उन्‍हें पूरी तरह सार्वजनिक तो नहीं किया जा रहा है पर शोध से जो हमारी राय बन रही है उसे इन आंकड़ों पर भी विचार कर ही तैयार किया गया है।


सबसे पहले तो ये समझें कि नए एग्रीगेटर आने से नारद का ट्रेफिक कुछ कम तो हुआ है पर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि नारद के ट्रेफिक को चिट्ठाजगत या ब्‍लागवाणी खा गए हैं- हॉं यह जरूर है कि अब नारद बहुत ही कम लोगों का एकमात्र या प्रेफर्ड एग्रीगेटर है (यह अरविंदजी के सर्वेक्षण से भी पता चलता है) पर तब भी कुल मिलाकर लोगों के फेरे एग्रीगेटरों पर बढे हैं- यदि सभी एग्रीगेटरों के दिनभर के औसतन यूनीक विजीटरों को जोड़ लिया जाए तो ये पहले के नारदीय ट्रेफिक से कहीं ज्‍यादा है।


आपसी तुलना करे तो चिट्ठाजगत (अनुमान) व ब्लॉगवाणी को तो नारद से ट्रेफिक मिल रहा है किंतु नारद को इनसे ट्रेफिक नहीं मिल रहा या कम मिल रहा है। यह भी रोचक है कि ट्रेफिक की दृष्टि से जल्‍द ही तीनों एग्रीगेटर समतुल्‍य स्थिति में आने वाले हैं पर पुराने लिंकों के वजूद में होने का लाभ नारद के पक्ष में है- टैक्‍नॉराटी पर तीनों की स्थिति से बात स्‍पष्‍ट होती है। विपुल का चिट्ठाजगत तेजी से 112 जगहों से आ रहा है तथा 46000 के लगभग रेंक पर है जबकि ब्‍लागवाणी संभवत किसी तकनीकी वजह से टैक्‍नारॉटी पर नजर नहीं आता जबकि नारद 148 की अथॉरिटी के साथ 33662 पर है जो किसी भी हिंदी चिट्ठे से ज्‍यादा है (निकटतम शायद रविजी हैं 40984 के साथ) जहॉं चिट्ठाजगत के 112 अथॉरिटी, नारद के 148 की तुलना में ज्‍यादा दूर नहीं दिखते वहीं यदि लिंकों की कुल संख्‍या पर विचार करें तो असल तस्‍वीर दिखाई देती है- नारद के 4915 लिंक जबकि चिट्ठाजगत के हैं केवल 1012 लिंक। मतलब यह कि अभी तो दोनों में जमीन असमान का अंतर है।


आसान भाषा में इस आंकड़ेवाजी से जो बात निकलकर आती है वह यह कि हिंदी चिट्ठासंसार नारद की जगह पर दूसरे एग्रीगेटरों को न देखकर सबको एक साथ देखने पर जोर दे रहा है। दूसरी बात यह कि माने न माने आपस में एक स्पर्धा है (और होनी चाहिए) पर अब तक तो स्‍वस्थ ही है। और हॉं नारद आज की स्‍िथति में तो 'न डाउन है न आऊट' पर साथ ही यह भी है कि पहले की 'लिंकित प्रापर्टी' के चलते अभी कुछ समय तक उसके शीर्ष पर बने रहने की ही संभावना दिखाई देती है किंतु नए चिट्ठों को शामिल कर सकने की उसकी क्षमता पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।

आंकड़े उपलब्‍ध कराने व विश्‍लेषण में सहयोग के लिए मित्रो का आभार


Friday, July 20, 2007

नारद की गिरती आवाजाही थामना जरूरी है

नारद की आवाजाही पर हमें नजर रखनी पड़ती है, क्या करें काम ही ऐसा है बिना ये जाने कि कितने लोग आ जा रहे हैं, चिट्ठाकारी की दिशा का अनुमान करना कठिन है। इसलि जब एकाएक यह आवाजाही बढ़ी तब भी हमें बताने लायक बात लगी उसी तरह हमने ये भी दर्शाया कि विवाद काल में नारद आवाजाही बढ़ती है। अब जब एक से ज्‍यादा एग्रीगेटर मैदान में हैं- देबाशीष याद दिला चुके हैं कि पहले भी नारद का कोई एकाधिकार नहीं था- हालांकि पुख्‍ता आंकड़ों के अभाव में भी हमें लगता है कि नारद की लोकप्रियता इतनी अधिक हुआ करती थी कि अन्‍य की स्थिति बहुत मायने नहीं रखती थी। इतने अधिक 'थी' इसलिए इस्‍तेमाल कर रहे हैं क्‍योंकि चिट्ठों की संख्‍या में आए इस उफान (चिट्ठाजगत इस समय लगभग 800 चिट्ठों को शमिल कर रहा है जबकि हमारे साथ ही शोध प्रारंभ करने वाली सह शोधार्थी गौरी ने एक यथार्थपरक अनुमान लगाते हुए फरवरी मार्च में 60-'70 सक्रिय चिट्ठों का अनुमान प्रस्‍तुत किया था) के वावजूद नारद के ट्रेफिक में खासी कमी आई है। अगर आलोकजी की शब्‍दावली में कहें तो नई दुकानों से पुरानी दुकान की ग्राहकी पर असर हुआ है। अभी केवल शुरुआत है तथा नारद के विपरीत चिट्ठाजगत व ब्‍लॉगवाणी के आवाजाही आंकड़े सार्वजनिक नहीं है इसलिए भी अभी यह कहना कठिन है कि इन एग्रीगेटरों के ट्रेफिक की आपसी सहसंबद्धता क्‍या है। पर इतना तय है कि चिट्ठाजगत के सामने आने के आस पास ही ट्रेफिक का यह चार्ट दक्षिणोन्‍मुख हुआ है। नारद तक पहुँचने वाले यूनीक विजीटरों की संख्‍या का मई से अब तक का लेखा जोखा इस प्रकार है-





यूनीक विजीटरों के आंकड़ों को इसलिए लिया गया है क्‍योंकि संभवत् सर्फर प्रतिबद्धता का सबसे सटीक अनुमान इनसे ही मिलता है वैसे पेजलोड के आंकड़े भी इसी अनुपात में ही हैं। क्‍या नारद के बढ़ते कदमों में लगी ये लगाम के हिंदी चिट्ठाकारी के लिए कोई गंभीर संकेत हैं- हमारा अनुमान है कि नहीं और हॉं दोनों ही ठीक है। जैसा रविजी व देबाशीष दोनों ही बताया कि नए एग्रीगेटरों का आना कुल मिलाकर बेहतर ही है पर दिककत यह है कि यदि उनकी पेशकदमी का मतलब नारद के ट्रेफिक में कमी आना है तो ये संकेत भले नहीं कहे जा सकते क्‍योंकि इसका मतलब है कि कुल मिलाकार चिट्ठाकार आधार (ब्‍लॉगर बेस) कम है तथा वह सभी एग्रीगेटरों को ट्रेफिक देने में असमर्थ है, दूसरे शब्‍दों में पाई का आकार इतना नहीं बढ़ा है कि सबका पेट भर सके- हालांकि तब भी सब साथ साथ रह सकते हैं खासकर इसलिए कि अभी तक तीनों में से किसी के भी व्‍यवसायिक घोषित लक्ष्‍य नहीं हैं, इसलिए ट्रेफिक कम भी रहा तो भी शायद ये दुकान न समेटें। लेकिन नारद के रूतबे में कमी किसी भी हिंदी बेवसाइट या चिट्ठों के लिए एक बुरी खबर है। एक बात यह भी कि चिट्ठाजगत व बलॉगवाणी को अपना लायल्‍टी बेस बनाना नहीं पड़ा नारद के ही लायल ग्राहक उन्‍हें स्‍वमेव मिल गए हैं इससे वे कई कसालों से बच गए हैं।

आलोकजी ने अपने निवेश सलाह के पोर्टल पर बताया कि आईटी व इंटरनेटी कंपनियों की खासियत यह होती है कि उनके पास लंबी चौड़ी भौतिक संपदा यानि जमीन जायदाद नहीं होती कि वे अपने औसत निष्‍पादन के बाद भी सश्‍ाक्‍त मानी जाएं, उनकी प्रोपर्टी तो आभासी ही होती है यानि ....


मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की किसी भी कंपनी के पास न्यूनतम भौतिक संपत्ति होती है। जैसे किसी टैक्सटाइल कंपनी के पास जमीन होती है, प्लांट होता है। मशीनरी होती है। डूबती कंपनी को यह सब बेच-बाचकर भी मोटी रकम खऱीद सकती है।


दरअसल इंटरनेट बेहद आवारा नींव पर खड़ी इमारत होती है तथा इसके मनचले स्‍वभाव के कारण हर बेवसाइट को अपने ग्राहक लगातार बनाए रखने जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है। कोई भी संस्‍था अपना कद भी यही मानकर चल रही होती है कि वह आपने वफादार ग्राहकों को तो कम से कम बनाकर रख ही पाएगी। अत: हमें इसे हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अहम संकेत के रूप में देखना चाहिए।