यह चिट्ठाकारों की चिट्ठाई शख्सियत का आख्यान है, यानि वे अपने बारे में क्या राय रखते हैं (प्रोफाइल व खुद की पोस्टें), अन्य उनके विषय में क्या राय रखते हैं (टिप्पणियॉं व अन्य लोगों की पोस्टें), व्यक्तित्व के अन्य अभिव्यक्त पक्ष जिनमें उनके द्वारा चुने विषय, शैली अआदि पक्षों पर विचार किया गया है। शोध की शैली पुन: नैरेटिव विश्लेषण की ही है। अत: इसमें एक सीमा के बाद व्यक्तिनिष्ठता आने का जोखिम होता है, भले ही हमने बाकायदा इस व्यक्तिनिष्ठता को सीमित रखने का प्रशिक्षण लिया हुंआ है। इस शख्सियत आख्यान को समूचे व्यक्तित्व पर लागू न किया जाए- कोई चिट्ठाकार अपनी जाति जिंदगी में कैसा इंसान है इसका विश्लेषण करने में मेरी रूचि नहीं है। दूसरी बात यह कि ये काम शुद्धत: शोध के लिए किया जा रहा है- शोध की अंतिम रपट में यह कैसे जुड़ेगा यह समय रहते बताया जाएगा। सभी लोगों का विश्लेषण यहॉं संभव नहीं यह कार्य क्रमश: है।
आज सुनीलजी की बात करें (निर्विवाद से शुरू करना ही बेहतर है, यूँ भी सुनील हमारे प्रिय ब्लॉगर हैं)

सुनील जाहिर है सबसे लोकप्रिय चिट्ठाकार हैं। उनकी प्रोफाइल बेहद संक्षिप्त है उसमें यदि आज के तरकश के साक्षात्कार को जोड़ लिया जाए तो उनके व्यक्तित्व की जो छाप बनती है वह है- सुनील एक संवेदनशील व संतुलित व्यक्तित्व के स्वामी हैं। उनकी लेखनी में यह संवेदनशीलता सहज ही जाहिर होती है। उनकी अवलोकन क्षमता गजब की है। बहुभाषिक व बहुसांस्कृतिक अनुभवों के कारण वे सहज ही सबसे परिपक्व हिंदी चिट्ठाकार हैं। इस परिपक्वता को वे बोझ नहीं बनने देते इसलिए वे किसी किस्म का अग्निशमन दस्ता नहीं परिचालित करते, और ये कार्य कहीं कम परिपक्वता के साथ जीतू और अनूप आदि को करना पड़ता है। सुनील की चिट्ठाकारी को सबसे अधिक व्याख्यायित करते उनके शब्द हैं-
मेरे विचार से चिट्ठे लिखने वाले और पढ़ने वालों में मुझ जैसे मिले जुले लोगों
की, जिन्हें अपनी पहचान बदलने से उसे खो देने का डर लगता है, बहुतायत है. हिंदी में
चिट्ठा लिख कर जैसे अपने देश की, अपनी भाषा की खूँट से रस्सी बँध जाती है अपने पाँव में. कभी खो जाने का डर लगे कि अपनी पहचान से बहुत दूर आ गये हम, तो उस रस्सी को छू कर दिल को दिलासा दे देते हैं कि हाँ खोये नहीं, मालूम है हमें कि हम कौन हैं.
अपनी चिट्ठाकारी के भविष्य पर सुनीलजी ने मेरे टैग-प्रश्नों के उत्तर में कहा था-
मेरी चिट्ठाकारी का भविष्य शायद कुछ विशेष नहीं है, जब तक लिखने के लिए मन में कोई बात रहेगी, लिखता रहूँगा, पर मेरे विचार में जैसा है वैसा ही चलता रहेगा. मेरे लिए
चिट्ठाकारी मन में आयी बातों को व्यक्त करने का माध्यम है, जिन्हें आम जीवन में व्यक्त नहीं कर पाता, और साथ ही विदेश में रह कर हिंदी से जुड़े रहने का माध्यम है.
अन्य चिट्ठाकारों की राय प्रथम दृष्ट्या प्रभावित होने वाली है, हालांकि कुछ गहरे पैठने पर एक किस्म का ‘पहुँची चीज़ हैं भई..’ वाला भाव भी दिखाई देता है। प्रमोद के बीस साल बाद उपन्यास में उनका चित्रण कुछ ऐसा ही संकेत करता है-
‘अबकी सुनील दीपक दिखे. पुलिसवाले उनके पीछे नहीं साथ थे. बहस हो रही थी. दीपक बाबू इटैलियन में झींक रहे थे, पुलिसवाले उन्हें मराठी में समझा पाने में असफल होने के
बाद अब चायनीज़ की गंदगी पर उतर आये थे.पता चला हरामख़ोरों ने भले आदमी का कैमरा जब्त कर लिया है. सुनील दीपक ने चीखकर कहा रवीश कुमार ऐसे नहीं छूटेगा, वे मामला एमनेस्टी इंटरनेशनल तक लेकर जायें’
कुल मिलाकर सुनील की चिट्ठाई शख्सियत अपनी हिंदी (सिर्फ भाषा नहीं सम्यक हिंदी) जड़ों से ऊर्जा लेती है। वे विवादों से दूर रहना पसंद करते हैं- चिट्ठाई अहम के संघर्षों से भी। बाकी कुछ आप जोड़ना चाहें तो बताएं।
(अन्य चिट्ठाकारों पर बाद में)




