Monday, December 17, 2007

क्‍या हिन्‍दी चिट्ठाकारी थ्‍योरिटिकल इनएडिकुएसी से ग्रस्‍त है

हिन्‍दी की चिट्ठाकारी पर हिन्‍दी की दुनिया (यानि खांटी हिन्‍दी वाले....लेखक, प्राध्‍यापक, आलोचक, चकचक आदि) की प्रतिक्रियाएं सुनने का जितना अवसर हमें मिलता उतना अन्‍य चिट्ठाकारों को शायद नहीं वजह बस इतनी हे कि इस कोटि के लोगों को हम सहज उपलब्‍ध हैं, बस हाथभर की दूरी पर। इसलिए विश्‍वास से कह सकते हैं कि हाल में गैर चिट्ठाकार हिंदीबाजों में चिट्ठाकारी को लेकर बेचैनी बढ़ी है। कवर स्‍टोरियों और हर मंच से हो रही बातों ने उन्‍हें विश्‍वास दिला दिया है कि अब नजरअंदाज भर करने से काम नहीं चलेगा। चिट्ठाकारी को जानना पड़ेगा और उखाड़ना पड़ेगा। नीलिमा के हालिया काम के बाद एक के बाद कई अखबारी लोगों ने हिन्‍दी चिट्ठाकारी का लेकर सवाल जबाव किए हैं जो या तो छप रहे हैं या छप चुके हैं। इस सब के मायने क्‍या हैं ? पहले तो खुश होने आदि की रस्‍म निबाही जा सकती है कि लो देखो हम तो कह ही रहे थे कि ऐसा होगा वगैरह वगैरह। पर कुछ सवाल भी खड़े होते हैं, ये हैं तैयारी के। हम कितने तैयार हैं। 1370 चिट्ठे, 40000 पोस्‍टों के बाद हिन्‍दी चिट्ठाकारी कितनी तैयार हो पाई है।




हम पाते हैं कि अपने बिंदासपन के लिहाज से और विविधता के लिहाज से चिट्ठाकारी अपनी गति से चल रही है और बिंदास चल रही है तथा यही वह शक्ति है जो गैर चिट्ठाकारों को आकर्षित कर रही है। एक अन्‍य पक्ष तकनीक का है तथा सहज ही कहा जा सकता है कि पठ्य,पॉडकास्‍ट, वॉडकास्‍ट आदि के कारण यहॉं भी चिट्ठाकारी ने संतोषजनक काम किया है। गैर तकनीकी लोग भी जब कुछ तकनीकी काम कर रहे हैं तो सहजता से इसे अन्‍य लोगों से बॉंट रहे हैं। इसलिए हम पाते हैं कि अब हिन्‍दी चिट्ठाकारी पर ये सवाल नहीं लगाए जा रहे हैं कि चिट्ठों को गिनती के लोग पढ़ते हैं (क्‍योंकि हिन्‍दी साहित्यिक पत्रिकाओं की दयनीय हालत के चलते सच तो यह है कि कई चिट्ठाकार शायद अभी से बहुत से प्रिंट लेखकों से ज्‍यादा पढे जा रहे हैं) न ही विषयगत विविधता ही कम है। हॉं आलोचकीय तेवर के लोग कभी कभी गुणात्‍मकता का सवाल जरूर उठा पाते हैं। पर ये उनके सबसे दमदार सवाल नहीं हैं।




उनके सबसे दमदार सवाल जो उठने शुरू हुए हैं और जिनपर चिट्ठों में उतना विचार नहीं हुआ है।वे आलोचकीय विवेक से उपजे सैद्धांतिकी के सवाल हैं। खुद लिंकित मन में भी एंप्‍रिकल दृष्टि से चिट्ठों पर विचार अधिक किया गया है जबकि हिन्‍दी चिट्ठाकारी पर थ्‍योरिटिकल मनन कम हुआ है, जो हुआ है वह इधर उधर बिखरा है, आर्काइवों में दब गया है। यह वह मंच है जहॉं हम कुछ बेहद सामर्थ्‍यवान चिट्ठाकारों के होते हुए भी कम ध्‍यान दे पा रहे हैं। मसलन हिन्‍दी चिट्ठाकारी की 'थ्‍योरिटिकल इनएडिकुएसी' से निजात दिलाने में शास्‍त्रीजी, ज्ञानदत्‍तजी, अभय, देबाशीष, अनिल, अनामदास, राजीव, उन्‍मुक्‍त जैसे चिट्ठाकार भूमिका अदा कर सकते हैं (नीलिमा का नाम नहीं गिनाया पर उनके पास तो इस 'जिम्‍मेदारी' से बचने का कोई उपाय है ही नहीं, कई अन्‍य सामर्थ्‍यवानों के नाम भी छूट गए हैं) मुझे लगता है कि हाल के ब्‍लॉगिंग चिंतन पर बाजार का दबाब यानि हिट, लिंक, ब्रांड कंसोलिडेशन, एग्रीगेटर, टिप्‍पणी आदि का दबाब कुछ बढ़ गया है तथा इसने सैद्धांतिकी की गुजांइश कुछ कम की है। थ्‍योरिटिकल इनएडिकुएसी की थ्‍योरिटिकल वजह ये जान पड़ती है कि हिंदी चिट्ठाकार आमतौर पर ये मानते हैं कि ये व्‍यक्तिगत उछाह को कहने का जरिया भर है...मतलब इस माध्‍यम को सैद्धांतिकी की जरूरत नहीं है- (किंतु सच यह है कि अंग्रेजी तथा अन्‍य भाषाओं में ब्‍लॉगिंग को लेकर सिद्धांत गठन को महत्‍व दिया जाता रहा है)




अंत में वे कुछ सवाल जो यहॉं या वहॉं उठाए गए तथा हमें ब्‍लॉग सैद्धांतिकी के सवाल जान पड़ते हैं, ये सभी अनुत्‍तरित सवाल नहीं है किंतु इनके अभिलेखित उत्‍तर अपेक्षित हैं-


ब्‍लॉग स्‍वयं में माध्‍यम न होकर उपमाध्‍यम भर है- यह अंतरजालीय सैद्धांतिकी के मातहत संरचना है इसलिए इसकी 'स्‍वतंत्रता' एक दिखावा भर है।


पुस्‍तक व छापेखाने की ही तरह यह इतिहास का दोहराव भर है जो हाईपर टेक्‍स्‍ट की हेज़ेमनी को वैसे ही खड़ी कर रही है जैसी कभी मुद्रित शब्द ने खड़ी की थी।


असिमता के सवाल को ब्‍लॉगिंग बार बार दोहराती हे बिना इस अंतर्विरोध को सुलझाए कि अगर यह पहचान की कमी के मारों का जमावड़ा ही हे तो कैसे पहचान से जुड़े सत्‍ता संरचना (राजनीति) से मुक्‍त होने का दावा करने की सोच भी सकता है।


डिजीटल डिवाइड को अगले स्‍तर तक ले जाती ह हिन्‍दी ब्‍लॉगिगं


प्रतिरोध के स्थान पर समर्पण का विमर्श है हिन्दी चिट्ठाकारी।


ऐसे ही कुछ और भी सवाल हैं, मुठभेड़ के लिए तैयार।






Wednesday, December 12, 2007

अब मेरे लिंकित मन का क्या होगा ?

अपनी पिछ्ली पोस्ट में मैंने जब अपने शोध की अवधि के समाप्त होने की घोषणा करते हुए शोध के नतीजों का नमूना पेश किया तो बहुत सी बधाइयां और सराहना मिली  ! पर आलोक जी ने बधाई देते देते एक बहुत ही वाजिब शंका हवा मॆं उछाल दी कि अब लिंकित मन का क्या होगा ? जब मैंने यह काम शुरू किया था मुझे जरा भी आभास नहीं था कि यह काम इतना रोचक होगा और न ही यह पता था इस काम को करने के दौरान मेरा खुद का मन कितना लिंकित होगा ! आज मेरे शोध की अवधि खत्म हो गई है पर शोध की यह प्रकिया जारी रहने वाली है !आलोक जी, ब्लॉगों पर शोधपरक विचारों की इस खुली चौपाल ' लिंकित मन'  पर हिंदी ब्लॉग के विकास का इतिहास दर्ज होता रहेगा ! हिंदी ब्लागिंग पर शोध का यह काम सराय के सौजन्य से बहुत सही समय पर शुरू हुआ है ! इस काम की स्तरीयता का अनुमान तो भविष्य में ही हो पाएगा पर हिंदी चिट्ठाकारिता के इतिहास का दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया जारी रहनी भी बहुत अहम है ! अब तक लिंकित मन पर मैंने यथासंभव शोधपरक ईमानदारी को निभाया है ! आगे भी इस पहल को जारी रखा जाएगा ! लेकिन अब लिंकित मन मेरा निजी चिट्ठा न होकर एक सामूहिक प्रयास से हिंदी ब्लॉगित जाति के मन को लिंकित करने की एक कोशिश के रूप में सामने आएगा ! मैंने प्रारंभ से ही इस ब्लॉग को "हिंदी ब्लॉगों से संबंधित शोधपरक विचारों की एक खुली चौपाल " कहा है ! लिंकित मन पर लिखित चिट्ठों पर आईं टिप्पणियों के जरिए मुझे शोध की दिशा व उसके स्वरूप के बारे मॆं आप सबकी राय मिलती रही है और इस तरह यह शोध एकालाप और निष्क्रिय वैचारिक प्रलाप न होकर जीवंत और समसामयिक बना रहा !अब लिंकित मन का क्या होगा ?जैसा सवाल मेरे मन में अब तक नहीं उठा था क्योंकि इस काम से जुडाव- लगाव की स्थिति रही है और शुरू से ही यह काम  एक जारी रहने वले चिट्ठे के बतौर शुरू किया गया था ! वरना मैं शोध के लिए कोई और दबा छिपा परंपरागत तरीका भी अपना सकती थी ! शोध की औपचारिकताएं मात्र निभाई गईं हैं शोध तो लगातार जारी है आज भी ! 

मेरे द्वारा हिंदी चिटठाकारी के स्वरूप और विकास को समझने का प्रयास अब तक की हिंदी चिट्ठाकारिता के इतिहास को दर्ज करता है ! भविष्य की हिंदी चिट्ठाकारिता की समझ तभी बनेगी जब हम लगातार ब्लॉगित समाज के लिंकन के पैर्टनों और खासियतों को समझते चलें ! तो लिंकित मन पर आप सबका स्वागत है ! आप सभी अपने हिंदी ब्लॉगिंग के अनुभवों और ब्लॉगरी के बारे में अपनी समझ व  राय को लिंकितमन पर लिखिए ! लिंकित मन अब मेरा निजी चिट्ठा न होकर हिंदी ब्लॉगिया जाति के अंदाज को बयां करने का एक मिलाजुला कदम होगा ! तो फिर  आइए रचॆं हिंदी चिट्ठाकारिता का एक मौलिक मुहावरा और  रचॆं एक सामूहिक इतिहास !! आमीन !!

Thursday, December 6, 2007

यूँ हुआ उस महफिल में चर्चा तेरी हिम्मत का

 

हिन्‍दी चिट्ठाकारी पर आज हमने अपना परचा प्रस्‍तुत किया। हमारे लिए मुश्किल काम था एक तो इसलिए कि ब्‍लॉगरों के बीच अपनी बात रखने में सुविधा रहती है कि आपकी बात जिसे ठीक नहीं लगेगी वह कह देगा कि ये आपकी राय है पर हम इससे कुछ अलग सोचते हैं। पर एक ऐसे विद्वत समुदाय के समक्ष जो अपने अपने क्षेत्र में तो पारंगत हैं पर चिट्ठाकार अनिवार्यत नहीं है, वे तो हमें हिंदी चिट्ठाकारों की नुमांइदगी करने वाला मान बैठेंगे...यही हुआ भी। पूरे चिट्ठाकार समुदाय का प्रतिनिधित्‍व एक गुरूतर काम था और हम कतई नहीं समझते कि हम इस योग्‍य हैं। खैर...हमने जैसा ब्‍लॉगजगत को समझा है लोंगों के सामने रखा। बाद में लोगों ने दाद भी दी (पर पता नहीं ये शिष्‍टाचार था कि व्‍यंग्‍य :))

परचा लंबा है इसलिए यहॉं नहीं दिया जा रहा, उम्‍मीद है जल्‍द प्रकाशित किया जाएगा।  फिलहाल हम उस पावर-प्‍वाईंट प्रस्‍तुतिकरण की स्‍लाइड्स को दिखा रहे हैं जो हमने इस कार्यशाला में दिखाईं। कार्यशाला अभी LTG सभागार मंडी हाऊस में जारी है तथा दो दिन और चलेगी।

 

स्‍लाइड्स

Wednesday, November 28, 2007

टू ब्‍लॉग ऑर नॉट टू ब्‍लॉग ?

 

शोध निष्‍कर्षमाला-2

आपका ब्लॉग आपके लिए क्या अहमियत रखता है ? क्या वह इंटरनेट की कल्पनातीत गति वाली सडक पर आपके द्वारा खोली गई एक दुकान है ? या फिर आपका एक ऎसा पवित्र कोना है जहां बैठकर आप अपने उदासी भरे गीत गा- सुना सकते हैं ? या फिर यह आपके लिए अंदर के आवेश और भडास को जगजाहिर कर  दुनिया को क्रांति के मुहाने पर ला खडा करने का एक चमत्कारी रास्ता है ? आप प्रिंट माध्यमों से पछाड खाकर यहां औचक ही पहुंच गए एक संभावनापूर्ण लेखक हैं जिसको भविष्य की रोजीरोटी यहीं से पैदा होने की उम्मीद है ?
ब्लॉग क्रांति के घट जाने के बाद अब ब्लॉगिंग क्यूं की जाए ? और ब्लॉगिंग व्यवहार किन कारकों से प्रभावित होता है ?-  सरीखे सवालों की पडताल करते हुए ब्लॉगिंग की उत्प्रेरणा , ब्लॉगिंग की मंशा और ब्लॉगिंग व्यवहार पर विचार करने वाली कुछ सामग्री मिली !जब ब्लॉगिंग की प्रक्रिया पर विचार करते हैं तो यह बात खुल कर सामने आती है कि विश्व की दूसरी भाषाओं में हो रही चिट्ठाकारिता से फिलहाल हिंदी चिट्ठाकारी का तेवर अलग है ! एक मायने में यह एक पास आता हुआ समाज है जहां इस विधा के उदय व विकास पर तीखी बहसें हैं , भाषा व तकनीक का  तालमेल साधने वाले आचार्य हैं , तीखे सामाजिक विमर्श करने वाले चिट्ठाकार हैं , संवेदना के धरातल पर कविता और गद्यगीत करने वाले रचनाकार हैं , चिट्ठाकारी के लिए आचार संहिता तथा उसके स्वरूप पर वैचारिकियां देने वाले नीतिकार हैं ,इंटरंनेट पर हिंदी साहित्य के दस्तावेजीकण का प्रयास करने वाले रचनाकार हैं ! वे भी हैं जिनका उद्देश्य चिट्ठाकारिता के जरिए हिंदी भाषा का सजग विकास करना है ---! यहां हल्का -भारी एक साथ है ! लेखक आलोचक एक साथ है !   ...कह सकते हैं कि हिंदी चिट्ठाकारिता पाठक बना रही है और इसका उल्टा कि पाठक ब्लॉग बना रहे हैं -Blogs creat the audience and the audience creat the blogs ! जाहिर है कि एक चिट्ठाकार का ब्लॉग व्यवहार दूसरे चिट्ठाकार के ब्लॉग व्यवहार  की तुलना में अलग है !

यहां हम फिर उठाए गए सवाल पर पहुंचते हैं कि हिंदी ब्लॉगित जाति का ब्लॉग बिहेवियर कैसा है तथा वह किन कारकों से प्रभावित होता है ! ब्लॉगिंग की उत्प्रेरणा चिट्ठाकार के लिए कम या ज्यादा हो सकती है ! कोई भी चिट्ठाकार अपने द्वारा की गई चिट्ठाकारिता के परिणाम या प्रतिफल के लिए कितना आकर्षित है -इसी से तय होता है कि अमुक चिट्ठाकार में ब्लॉगिंग के लिए कितना उत्प्रेरण है ! हिंदी ब्लॉगित समाज में ब्लॉगिंग के प्रतिफल का आकर्षण बहुत है ! चिट्ठाकार को अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों का इंतजार रहता है , व्यावसायिक भविष्य को लेकर सजगता  है ,सामाजिक संबंध बनाने की कामना भी है !  यहां स्वांत; सुखाय रधुनाथ गाथा गाने की कामना कम ही है !  छोटे पर सक्रिय संवाद समूहों की विनिर्मिति इसका खास पहलू है ! दरअसल चिट्ठाकारों की ब्लॉगिंग मंशा (इंटेंशन) का सीधा संबंध ब्लॉगिंग उत्प्रेरण से है ! जितना अधिक उत्प्रेरण होगा उतनी ही मजबूत ब्लॉगिंग इंटेशन होगी ! हिंदी के कई चिट्ठाकार अभी स्थापित होने की प्रक्रिया में हैं अत: ये चिट्ठाकार अपने ब्लॉग की भविष्यगत संभावनाओं पर विचार का काम उतनी सजगता से नहीं करते !. चिट्ठों और उनपर आने वाली टिप्पणियों के कॉपीराइट के निर्धारण को लेकर कई चिट्ठाकारों ने विमर्श किया है! चिट्ठों के रोमन प्रतिरूप पर किसका कॉपीराइट है यह सवाल भी हाल ही में उठा और उसपर काफी बहस का माहौल बना ! इससे जाहिर होता है कि हिंदी चिट्ठाकारी ने आकार लेना शुरू कर दिया है तथा चिट्ठाकार अपने लिखे चिट्ठों की सामग्री की उपादेयता व उसके भविष्य की संभावनाऎं तलाश रहा है !

ब्लॉगिंग़ इंटेंशन का ब्लॉगिंग बिहेवियर से सीधा सहसंबंध है ! ब्लॉग करने के आकर्षणों तथा अपने ब्लॉग की उपादेयता को लेकर तेजी से सक्रिय होता ब्लॉगर अपने ब्लॉग के प्रबंधन में ज्यादा समय व उर्जा खर्च करता है !हिंदी चिट्ठाकारों में अभी पूर्णकालिक रूप से ब्लॉगिंग करने का माहौल नहीं बना है पर ज्यादातर ब्लॉगर समय की कमी के व पारिवारिक व्यावसायिक जिम्मेदारियों के बावजूद अपने ब्लॉग के लिए समय निकालने का भरसक प्रयास करते दिखाई देते हैं ! चिट्ठाजगत (  एक फीड एग्रीगेटर ) पर धडाधड महाराज की लिस्ट में सबसे ऊपर बने रहने की कामना हर चिट्ठाकार की है ! अपने ब्लॉग की साज सज्जा नाम अपने प्रोफाइल , ब्लॉगरोल   पाठकों की संख्या , टिप्पणी करने वालों को बढावा देने के लिए चिट्ठे की साइड बार में उनका सचित्र नामोल्लेख -- इन सबको लेकर चिट्ठाकार सक्रिय होते जा रहे हैं ! ब्लॉगिंग बिहेवियर में ब्लॉगर द्वारा अन्य ब्लॉगरों के चिट्ठों को पढना व उनपर टिप्पणी देना भी शामिल है ! इस कोण से देखने पर हिंदी का ब्लॉगर समुदाय नजदीक आता दिखाई देता है !यहां लिंकन प्रतिलिंकन की प्रवृति अधिकातर चिट्ठाकारों में दिखाई देती है ! विवादित मुद्दों पर लिखी गई पोस्टों के आसपास अनेक पोस्टों का जन्म होता है जिससे विवाद का मुद्दा भी विकसित होता चलता है तथा लिंकन के जरिए  उससे जुडी पोस्टों को भी पाठक या कहें कि ट्रेफिक  मिलता चलता है !  कम समय में ज्यादा चिट्ठे पढना व उनपर टिप्पणी देना  , टिप्पणी द्वारा दूसरे चिट्ठाकारों को अपने चिट्ठे तक लाना ,  इमेलिंग के जरिए मित्रों व परिचित ब्लॉगरों को नई पोस्ट की जानकारी देना , समय समय पर होने वाले चिट्ठाकार सम्मेलन , फोन के जरिए अपनी पोस्ट पर परिचित ब्लॉगरों की राय लेना  जैसी कई प्रवृतियां हैं जिनसे  एक पास आते , व्यवस्थित होते , उलझते , संवरते और आकार पाते हिंदी चिट्ठाकार समुदाय का स्वरूप उभरता है !

Sunday, November 25, 2007

हरएक के भीतर चमकता हीरा है ,हरएक के भीतर आत्मा अधीरा है

शोध निष्‍कर्षमाला-1

हर भली बुरी चीज कभी न कभी खत्‍म होती ही है, मेरे शोध की अवधि भी समाप्‍त हो गई है जल्‍द ही शोध के निष्‍कर्ष विद्वत समुदाय के समक्ष प्रस्‍तुत किए जाएंगे।

हिंदी चिट्ठाकारिता पर मेरी शोध के सबसे दिलचस्प सवाल रहा -हिंदी में चिट्ठाकारिता क्यों ? या हिंदी चिट्ठाकार चिट्ठा क्यों करता है ? इसके कई संभावित जवाब मुझे मिले -

1  हिंदी चिट्ठाकारिता चिट्ठाकार की प्रबल अनुभूतियों के निर्बंध प्रस्फुटन का माध्यम है ! इस बात का पता सहज ही अहसास होता है जब हम हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के खुद के ब्‍लॉग विवरण देखते हैं. 

1 अनूप- हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?,

2   प्रत्यक्षा- कई बार कल्पनायें पँख पसारती हैं.....शब्द जो टँगे हैं हवाओं में, आ जाते हैं गिरफ्त में....कोई आकार, कोई रंग ले लेते हैं खुद बखुद.... और ..कोई रेशमी सपना फिसल जाता है आँखों के भीतर....अचानक , ऐसे ही

3    नोटपैड- इस ब्लॉग के ज़रिये अपनी कलमघ‍सीटी को ब्‍लॉगबाजी में   तब्‍दील करने का इरादा है। हम तो लिख्‍खेंगे, पढ़ना है तो पढ़ो वरना रास्‍ता नापो बाबा।,

प्रमोद, चुप रहें और सोचें.. सोच के सागर में उतर जायें.. और बाहर आयें तो कोई नाटकीयता न हो.. कुछ महीन चमक चमके.. तारोंभरी रोशन रात दमके.. और कदम आगे बढ़ें.. धीमे-धीम

5 सुनील दीपक- क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं था, या फ़िर समय नहीं था, या फ़िर ...?

2  यह सामाजिक जुडाव तथा सम्प्रेषण की उत्कंठा को जाहिर करने  का       सहज माध्यम है ! अविनाश, अभय, लाल्‍टू, रवीश, नसीर, रियाज आदि ब्‍लॉगरों को देखें !

3  हिंदी चिट्ठाकार के लिए यह वैयक्तिक जीवन और अनुभवों के दस्तावेजीकरण का जरिया है !

4  चिट्ठाकार के वैयक्तिक विचारों , मत और राय को सामाजिक मंच प्रदान करने और इस जरिए से उसे मुख्यधारा जीवन में  हस्तक्षेप की संतुष्टि देने वाला जनमाध्यम है !

5  चिट्ठाकार के रूप में एक आम व्यक्ति को नैतिक , भावात्मक और सामाजिक पुनर्बलन की क्रिया-प्रतिक्रिया को संभाव्य बनाने का प्रकार्य करता है!

6 व्यावसायिक चिट्ठाकारिता की भविष्यगत संभावना को साकार करने के लिए ! रवि, टिप्‍पणीकार, मजेदार समाचार आदि को इस दृष्टि से देखा जा सकता है !

7 संरचनागत दबावों से निपटने का तथा व्यवस्था के प्रति विरोध दर्ज करने का सशक्त तरीका है !

8 हिंदी भाषिक अस्मिता की विनिर्मिति में लोक की सहभागिता का सबसे तीव्र माध्यम है !

यहां दिए गए ब्लॉगिंग करने के कारणों को उत्प्रेरक भी कह सकते हैं ! इन उत्प्रेरकों को आंतरिक उत्प्रेरक और बाह्य उत्प्रेरकों के रूप में बाटां जा सकता है !

सबसे अहम बात यह है कि चिट्ठाकारिता के लिए आम व्यक्ति को किसी विशिष्ट तकनीकी ज्ञान की जरूरत नहीं पडती ! पुशबटन किया और पब्लिश हो गया आपका विचार,खयाल और भाव ! संभवत: यही वह मुख्य कारण है कि कई नेट प्रयोक्ता सहज ही चिट्ठाकारी की ओर आकर्षित हो रहे हैं !दरासल हिंदी चिट्ठाकारी ने मुख्यधारा के बरक्स लोकमंच बनाया है !यहां रचनाकार ,संपादक ,पाठक ,पाठक सबका समाहार हो गया है ! यहीं से शुरू हो रहा है समानांतर मीडिया ,समानांतर साहित्य और समानांतर विमर्श  ! ब्लॉगिंग के माध्यम ने एक निष्क्रिय पाठक , एक निष्क्रिय सामाजिक को एक सक्रिय रचनाकार में परिवर्तित कर दिया है ! अब रिसीविंग एंड पर बैठा प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय सृजक हो गया है !आनंद की बात यह है कि समानांतर धारा मुख्यधारा से बहुत अधिक तीव्र ,सहज ,सशक्त और भौतिक परिसीमन से परे है !हिंदी चिट्ठाकारिता ने सूचना और ज्ञान के प्रवाह में आम हिंदी भाषी की हिस्सेदारी और हस्तक्षेप को संभव कर दिया है !