Sunday, January 6, 2008

चिट्ठाकारी का हालिया इतिहास

 

थोड़ा मुड़कर पीछे देखें तो हिंदी में चिट्ठाकारिता शब्‍द अंग्रेजी के ब्‍लॉगिंग शब्‍द के समानांतर उपजा शब्‍द है। ‘वेबलॉग’ का संक्षिप्‍त रूप ब्‍लॉग दिसम्‍बर 1997 में पहली बार प्रयुक्‍त हुआ। अंतर्जाल पर पहले ब्‍लॉग (1997, डेव वाइनर का ब्‍लॉग ‘स्क्रिप्टिंग न्‍यूज’) के उद्भव के छ: साल बाद पहले हिंदी चिट्ठाकार आलोक के पहले चिट्ठे 9-2-11 का पदार्पण हुआ। पहली पोस्‍ट में उन्‍होंने लिखा[i]

 

 

नमस्ते।
क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ देखें।

यहॉं वह पहला लिंक था जिस पर क्लिक करते ही कोई हिंदी पाठक विश्‍व के किसी भी द्वीप पर बैठा अपनी भाषिक पहचान के जुड़ सकता था। यह पहली यूनीकोड चिट्ठा अभिव्‍यक्ति थी। यूनीकोड के अवतरण से विश्‍व का प्रत्‍येक कंप्‍यूटर ‘हिंदी फांटों’ के झंझटों से मुक्‍त हो हिंदीमय हो गया तथा हिंदी लेखक-पाठक अपनी अनुभूति को टाईम व स्‍पेस के बंधनों से परे अंतर्जाल पर दर्ज कर सका। यहाँ टाईम, स्‍पेस और प्रौद्योगिकी के अद्भुत संयोग से उपजी स्‍वच्‍छंद भाषिक अभिव्‍यक्तियों को आलोक ने चिट्ठा कहा। आलोक के चिट्ठे ‘9-2-11’ के बाद विनय, देबाशीष, पंकज नरूला, अतुल अरोरा, रवि रतलामी, अनूप शुक्‍ला, जितेंद्र जैसे चिट्ठाकारों के द्वारा अंतर्जाल पर हिंदी को अंकित किया गया। यदि इनमें से अधिकांश के नाम आपने नहीं सुने हैं तो आश्‍चर्य की बात नहीं ये नींव की ईंटें हैं, कंगूरों के बड़बोलेपन से मुक्‍त। इनमें से कोई हिंदीबाज या हिंदीखोर नहीं है, विश्‍वविद्यालयों में प्रोफेसर नहीं हैं, रोजी रोटी के लिए अपने अपने उन व्‍यवसायों पर आश्रित हैं जिनका हिंदी से सामान्‍यत: कोई लेना देना नहीं। अनूप यानि फुरसतिया को छोड़ दें तो और कोई अपनी भाषा या शैली के लिए नहीं जाना जाता, केवल अपने श्रम और सहायता करने के लिए आतुर लोगों का जमावड़ा है यह। लेकिन इसके गहरे निहितार्थ हिंदी सत्‍ताई विमर्श के लिए भी हैं- पंकज नरूला, देबाशीष चक्रवर्ती व जिंतेंद्र चौधरी के माध्‍यम से हिंदी चिट्ठाजगत की स्‍थापना के निहितार्थ पढ़ते हुए प्रियंकर दर्ज करते हैं कि-

कभी-कभी तो मुझे यह सोच कर ही रोमांच होता है कि नेट पर हिंदी के शुरुआती कर्णधारों में पंकज नरुला, जितेन्द्र चौधरी और देबाशीष चक्रवर्ती के होने का भी एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है हिंदी की सार्वदेशिकता और स्वीकार्यता के संदर्भ में . मूलतः पंजाबी, सिन्धी और बांग्ला मातृभाषा वाले परिवारों के इन बच्चों का हिंदी से कैसा प्यारा नेह का नाता है कि वे इसे मुकुटमणि बनाए हुए हैं . उसके भविष्य को लेकर चिंतनशील रहते हैं . उसे मां का मान दे रहे हैं .

इसका एक प्रतीकात्मक अभिप्राय यह भी है कि अब हिंदी पर हिंदी पट्टी के चुटियाधारियों का एकाधिकार खत्म होने को हैं . आंकड़े कहते हैं कि अगले दस-बीस वर्षों में दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने वाले विभाषियों की संख्या मूल हिंदीभाषियों से ज्यादा होगी . और तब एक नये किस्म की हिंदी अपने नये रूपाकार और तेवर के साथ आपके सामने होगी .[ii]

जाहिर है शुरूआत में गिनती के चिट्ठे थे और उतने ही चिट्ठापाठक। खुद लिखते खुद पढ़ते और साथी चिट्ठाकारों को पढ़वाते। इस दौर की पूरी कथा हाल में जितेंद्र ने चार भागों में अपने चिट्ठे ‘मेरा पन्‍ना’ पर दर्ज की है। अनूप भी कह चुके थे कि हिंदी चिट्ठाकारी का जनून आला दर्जे का सिरफिरा होने की माँग करता है। जब इन कुल जमा सिरफिरों से ज्‍यादा सिरफिरे लोग यहाँ आ इकट्ठे हो जाएंगे तो ये खुशी से पार्श्‍व में चले जाएंगे-

रही बात अप्रासंगिक होने की तो हम लोग अप्रसांगिक तब हो जायेंगे जब हमसे बड़े तमाम सिरफिरे यहां जुट जायेंगे और हमसे बेहतर लिखेंगे, जीतेंन्द्र से बेहतर नारद और तमाम सुविधाऒं की चिंता-संचालन करेंगे, रवि रतलामी से ज्याद अपना लिखने के साथ-दूसरे का भी सबको पढ़वाते रहेंगे,दोस्तों-दुश्मनों की गालियां खाते हुये भी देबाशीष जैसे अकेले दम पर लगातार चार साल बिना किसी लाभ के इंडीब्लागीस जैसे आयोजन करने वाले आगे आ जायेंगे। हम तब अप्रासंगिक हो जायेंगे जब हमारे किसी भी काम की वकत खतम हो जायेगी और चिट्ठाजगत का हर सदस्य हमसे हर मायने में बेहतर होगा। जिस दिन ऐसा होगा वह दिन निश्चित तौर पर हमारे अप्रासंगिक हो जाने का दिन होगा और हमें उस दिन से खतरा नहीं है बल्कि ऐसे दिन का बेताबी से इंतजार है [iii]

एक बानगी और देखिए, हिंदी चिट्ठाकारी पैसे कमाने की मशीन नहीं है। अब तक किसी हिंदी चिट्ठाकार ने चिट्ठाकारी से इंटरनेट का बिल जमा करने लायक पैसा भी नहीं कमाया है। ‍लेकिन हिंदी चिट्ठाकारी के प्राण यानि नारद को खड़ा करने के लिए हजारेक डालर की जरूरत थी, ईस्‍वामी के शब्‍दों में-

हमें रातों रात अनुदान इकट्ठा करना था, पंकज नरूला को मैने फ़ोन किया, ई-चर्चा वाले मित्र सुनीत को किया, दोनो की बात करवाई, पंकज को पूरी जानकारी मिली - उन्होंने अमेजान पर अकाऊंट खोला और जो लोग क्रेडिट कार्ड धारी नहीं भी थे उन्होंने रातो रात क्रेडिट कार्ड धारियों के माध्यम से दुनिया भर से सहायता भेजी.

मेरी पत्नी हिंदी ब्लागिंग को मेरा खब्त मानती हैं, समय नष्ट करने का बेहतरीन साधन! जब देखते ही देखते आंकडा १००० डालर के पार पहूंच गया मैने उनकी आंखें खुशी के मारे नम देखीं! देयर इज़ अ मेथड टू यू गाईज़ मेडनेस!हां कुछ अलग कर दिया हमनें - सर्टिफ़ाईड पागलों वाला काम! clip_image002[iv]

यह ठीक तब ही हो रहा था जब हिंदी पट्टी के हिंदीखोर भूतपूर्व पति पत्‍नी अपने गत शादी के मन मुटावों के बाजार से पत्रिकाएं रंग रहे थे। खैर उस पर हसन जमाल (शेष के संपादक, इंटरनेट पर हिंदी के विरोध में उनकी प्रतिक्रिया मार्च 2007 के नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई) विचार करें और निपटें। ...तो उस दिन-रात की अकारण मेहनत की खब्‍त का परिणाम है कि आज हिंदी में तकरीबन 700 चिट्ठे 1500 चिट्ठे हैं ओर ये तेजी से बढ़ रहे हैं। नारद जिसकी फिलहाल हिंदी चिट्ठाजगत में केंद्रीय भूमिका है थी उसे अप्रैल 2007 के पहले बीस दिनों में 18743 हिट मिले हैं थे 937 की औसत प्रतिदिन के हिसाब से। नारद अकेला एग्रीगेटर नहीं है हिंदी ब्‍लॉग्स, हिंदी पॉडकास्‍ट भी हैं। हसन जमाल तो नहीं समझ पाएंगे और न समझ पाने के उनके तर्क व गर्व दोनों होंगे लेकिन ये बड़ी उपलब्धि है।


[i] आलोक, http://9211.blogspot.com/

[ii] प्रियंकर, अतीत के झरोखे से-4, http://www.jitu.info/merapanna/?p=703

[iii] अनूप शुक्‍ला, मुजरिम हाजिर है प्रत्‍यक्षा, http://vadsamvad.blogspot.com/2007/02/blog-post_24.html

[iv] ई-स्‍वामी, अतीत के झरोखे से-4, http://www.jitu.info/merapanna/?p=703

3 comments:

उन्मुक्त said...

अच्छा सारांश लिखा है।

संजय बेंगाणी said...

अच्छा लिखा है.

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

वाकई में अच्छा सारांश. लेकिन कम से कम 2007 के मध्य तक का इतिहास लिखे बिना इसे रोक न दें.