Friday, April 6, 2007

......क्‍योंकि असली खुजली दिमाग में ही होती है


भागीदार अवलोकन पद्धति यानि पार्टीसिपैंट आब्‍जर्वेशन मैथड से शोध करने में एक दिक्‍कत यह रहती है कि कब आप आब्‍जर्वर कम और पार्टीसिपैंट ज्‍यादा हो जाओ पता ही न‍हीं चलता। हमने शुरू से ही इस खतरे की ही खातिर जब इस पद्धति को अपनाया तो अपना शोध ब्‍लॉग अलग बनाया था ताकि घालमेल जितना हो सके कम हो। चिट्ठाकारी को आजकल तो काफी नजदीक से देख रही हूँ इसीलिए आज की चिट्ठाकारी पर तटस्‍थ दृष्टि से विचार में कठिनाई है इसलिए तय पाया कि अतीत की चिट्ठाकारी पर एक नजर डाली जाए और नैरेटिव्‍स इकट्ठे करें और जाने कि इन बैठे-ठालों खाते पीते घरबारी लोगों कि जिंदगी में आखिर कौन सी कमी थी कि ये चिट्ठाकारी करने आ बैठे। आज तो चलो पीठ में खुजली होती है इसलिए लिखते हैं (और खुजली सिर्फ पीठ में नहीं होती) लेकिन तब तो अपनी पीठ भी खुद खुजानी पड़ती थी फिर क्‍यों नहीं आराम से अपनी जिंदगी जीते रहे ? तो आज का विचारणीय विषय है हिंदी चिट्ठाकार हिंदी में चिट्ठाकारी क्‍यों करते हैं (थे)

हिंदी की पहली पोस्‍ट से मेरा पहला परिचय मसिजीवी के शोध आलेख से हुआ था। पोस्‍ट है-


"नमस्ते।
क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ
देखें।

आलोक द्वारा प्रकाशित।




इस आलेख में मसिजीवी ने इस पोस्‍ट की तुलना नील आर्मस्‍ट्रांग के उस प्रसिद्ध ‘छोटे से’ कदम से की है जो मानवता के लिए एक ‘ज्‍याईंट लीप’ था। उसके बाद की काफी कहानी अलग अलग जगहों पर दर्ज है, आजकल जितेंद्र यह कहानी यहाँ, यहाँ और यहाँ सुना रहे हैं। (सराए वाले रविकांत ये ना कहें कि हमें तो पका पकाया शोध प्रबंध तैयार मिल रहा है)
खैर इस पहले कदम के बाद जो जो लोग इस यात्रा में मिलते गए यानि आलोक, पद्मजा, देवाशीष चक्रवर्ती, जीतेंद्र चौधरी, ईस्वामी , पंकज नरूला, रमण कौल, रवि रतलामी, अतुल अरोरा, अनूप शुक्ला, बेंगाणी बंधु आदि वे आखिर क्‍यों लिख रहे थे, हिंदी में क्‍यों। मतलब पीठ छोडिए उनके हाथों में खुजली क्‍यों हो रही थी। जबाव पूरा तो हमारे पास नहीं है लेकिन अनुमान वही है जो मेरे शोध का विषय है- ये सब एक जाति से हैं मुलायम-माया के सरोकार की जाति नहीं वरन हिंदी जाति। हिंदी जाति का मन आपस में लिंकित होता हे इसी भाषा से। और ये सब इसे ब्‍लॉगित कर इनके लिंकित मन को ही अभिव्‍यक्ति दे रहे थे।
तभी तो-
जब जितेंद्र मिडिल ईस्‍ट पहुँचते हैं-

हिन्दी मे लिखने के लिये सबके अपने अपने कारण होंगे, क्योंकि हम सभी
अंग्रेजी मे भी लिखने की क्षमता रखते है, फ़िर भी हमने हिन्दी ही चुनी। मेरे तो
निम्नलिखित कारण है:
हिन्दुस्तान को छोड़ते समय लगा था, शायद हिन्दी पीछे छूट
गयी और अब तो बस अंग्रेजी से ही गुजारा चलाना होगा....


ओर बेबाकी और सूक्ष्‍मता से सुनील दीपक कह उठते हैं-



मेरे विचार से चिट्ठे लिखने वाले और पढ़ने वालों में मुझ जैसे मिले जुले
लोगों की, जिन्हें अपनी पहचान बदलने से उसे खो देने का डर लगता है, बहुतायत है. हिंदी में चिट्ठा लिख कर जैसे अपने देश की, अपनी भाषा की खूँट से रस्सी बँध जाती है अपने पाँव में. कभी खो जाने का डर लगे कि अपनी पहचान से बहुत दूर आ गये हम, तो उस रस्सी को छू कर दिल को दिलासा दे देते हैं कि हाँ खोये नहीं, मालूम है हमें कि हम कौन हैं.


वैसे जितेंद्र को इस सवाल के पूछे जाने से ही मानो आपत्ति हैं (कितनी प्‍यारी आपत्ति है)



अमां यार क्यों ना लिखे, पढे हिन्दी मे है, सारी ज़िन्दगी हिन्दी सुनकर गुजारी है। हँसे, गाए,रोये हिन्दी मे है, गुस्से मे लोगो को गालियां हिन्दी मे दी है, बास पर बड़्बड़ाये हिन्दी मे है। हिन्दी गीत, हिन्दी फ़िल्मे देख देखकर समय काटा है, क्यों ना लिखे हिन्दी?


वैसे विदेश में बसे चिट्ठाकार इस खुजली को कहीं ज्‍यादा शिद्दत से महसूस करते हैं। मसलन वरुण ने लिखा-



सच यही है कि मेरे हिन्दी ब्लॉग की शुरुआत के पीछे कौतूहल ही मुख्य भावना थी (मेरे स्कूल में भी एक भावना थी, वो फिर कभी). हिन्दिनी के टूल ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मेरा हिन्दी ब्लॉग एक किस्म का geek's show off ही था. पर फिर मैंने महसूस किया कि हिन्दी को मैं किस कदर "मिस" कर रहा था


हम देश में रह रहे हिंदीजीवी, हिंदीखोर, हिंदी प्रेमी इसे उतनी शिद्दत से महसूस नहीं करते क्‍योंकि ‘मिस’ नहीं करते। उनके लिए ये मेरी हिंदी जिंदाबाद का नारा नहीं है वे तो चिट्ठा लिखते हैं क्‍योंकि बस लिखते हैं, मसलन मसिजीवी कहते हैं -
मैं चिट्ठा अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे चिट्ठा लिखने की शराब की
तरह लत पड़ी हुई है.मैं चिट्ठा न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी.मैं चिट्ठा नहीं लिखता, हकीकत यह है कि चिट्ठा मुझे लिखता है. मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी. यूँ तो मैने किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे चिट्ठे लिखे हैं, जिन पर आए दिन विवाद चलते रहते हैं.


तो मित्रो आप भी सोचो और बताओ कि किसने कहॉं कहॉं बता रखा है कि वे हिंदी में चिट्ठाकारी क्‍यों करते हैं। और क्‍यों नहीं आप ही सोचकर बताते हैं कि आप हिंदी में चिट्ठाकारी क्‍योंकर करते हैं?

2 comments:

जगदीश भाटिया said...

नीलिमा जी, यहां दो सवालों की घालमेल हो रही है:
आप चिट्ठा क्यों लिखते हैं और आप हिंदी में चिट्ठा क्यों लिखते हैं।
हम कितनी भी भाषायें सीख लें शायद भावनाओं की असल अभिव्यक्ति अपनी ही भाषा में हो सकती है। इंगलिश हमारे ऑफिस की भाषा हो सकती है हमारी खुशियों की, हमारे गमों की और हमारे गीतों की भाषा नहीं हो सकती।
इंगलिश में तकनीक सीखाने वाले चिट्ठे आसानी से लिखे जा सकते हैं, मगर जब कोई दिल की बात कहना चाहेगा तो उसे अपनी मातृभाषा की कलम ही उठानी पड़ेगी।

Jitendra Chaudhary said...

धन्यवाद नीलिमा।

मै इस विषय पर कई बार लिख चुका हूँ, इसलिए ज्यादा बोर नही करूंगा। मै पहले अंग्रेजी मे ब्लॉग लिखता था, लेकिन शायद कभी वो अपनापन, गम्भीरता,चंचलता और संवेदना पहले हिन्दी मे महसूस करता था, फिर उसके लिए अंग्रेजी के सही शब्द ढूंढता था, फिर लिखता था। लेकिन मैने कई बार सोचा कि इस अनुवाद मे कभी कभी मूल भावना और भाव कंही खो जाता था। जब अभिव्यक्ति का बेहतर माध्यम (मातृ-भाषा) उपलब्ध हो तो कोई क्यों दूसरी भाषा मे ब्लॉग लिखे।

बाकी आप इस सम्बंध मे मेरे ब्लॉग विभिन्न लेख देखें।