Monday, April 23, 2007

मार दिया जाए या छोड दिया जाए बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए

हिंदी पट्टी में हलचल मचनी थी सो मच ही गई है ! हिंदी के बडे -बडे चिंतक अब अपने- अपने पाले डिसाइड करने में लग गयॆ हैं ! यह पाला - चिंतन उपजा है हाल में ही हिंदी- ब्लॉगिंग को लेकर जालजगत के बाहर हो रही सरगर्मियों की वजह से ! मीडिया जगत , साहित्य जगत , के सभी विद्द्वानों ने अपने- अपने कानों की सफाई कर ली है ताकि वे यहां उठते किसी भी स्वर को मिस न कर दें और ये अदाज लगाने से कहीं चूक न जाए कि अब किस मोड पे जाते हैं ये हिंदी बलॉगिंग की दिशा में उठे कदम ! जमाल भाई साहब के स्वरों में तू तकवाद तो दिखा ही दिया गया है ! शायद वे अपने खयालात में कुछ बदलाव लाने के बारे में सोचने लगे हों ! इधर कल हिंदी के प्रसिद्ध मीडिया विचारक सुधीश पचौरी जी ने भी हिंदी ब्लॉग जगत का नोटिस लेते हुए एक लेख हिंदुस्तान टाएम्स में लिखा है ! उन्होंने इस जगत के लेखन के तारीफी पुल बांधते हुए हिंदी के बडे लिक़्खाडों को बताया है कि कैसे यह लेखन नोटिस लेने योग्य है !

यह तो साफ है कि आज कई लिक्खाडों के जमावडॆ घात लगाए देख रहे हैं कि कहां जा रहे हैं ये चंद सिरफिरे, जुनूनी , बकबकिए ! क्या कर लेना चाहते हैं ये सब ! पहले अंधेरे में ये सुधी जन तीर चलाते थे अब तस्वीर साफ होती जान पड रही है सो समझदार दूरदर्शी लोग साथ आकर भी खडे होने लगेंगे ! किंतु कहीं ऎसा न हो कि ब्लॉग जगत पर राय खडी करने , उसका भविष्य तय करने का काम वे लोग करे रहे हों जो मुख्यधारा के नियंत्रक हैं और चिट्ठाकारी की आत्मा से जुडाव रखने वाले चिट्ठाकार इससे नाखबर रहें ! दूसरी बात यह कि इस विधा में जो खूबियां हैं उनमें अनंत संभावनाएं निहित हैं और पहले से स्थापित जगत से इसकी भिडंत होनी भी तय है ! इस भिडंत में और चाहे जो हो , पर यह न हो कि चिट्ठाकारी से उसका चेहरा छीन लिया जाए और कोई और बताय कि आप देखिए आप ऎसे दिखते हैं!

6 comments:

Srijan Shilpi said...

यह अंदेशा तो पहले से था। मसिजीवी जी ने भी इस बारे में संकेत किया था कुछ ही दिनों पहले। यह अच्छा हुआ कि सरोज सिंह, सुजाता जी और मसिजीवी जी आदि कई चिट्ठाकार साथियों ने अख़बारों में हिन्दी चिट्ठा जगत के बारे में खुद लेख लिखकर सही वस्तुस्थिति प्रस्तुत करने की कोशिश की। अब इस दिशा में प्रयास तेज करने होंगे हमें।

मैं तो मुख्यधारा की पत्रकारिता से बगावत करके ही चिट्ठाकारी में सक्रिय हुआ था और जब से इधर सक्रिय हुआ तब से मुख्यधारा से एक दूरी-सी बना ली। लेकिन अब लग रहा है कि मुख्यधारा का जो लाभ चिट्ठाकारी के हित में उठाया जा सकता है, वह उठाया जाना चाहिए। हममें से बहुत से साथी हैं जो मुख्यधारा से जुड़े हैं या जुड़े रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम चिट्ठा जगत की अंदरुनी उठापठक से यथासंभव बचते हुए मुख्यधारा के साथ अपने अंतर्संबंधों को फिर से परिभाषित करें। इसमें बस एक ही दिक्कत है और वह यह कि जब जिसे मौका मिलता है आत्मश्लाघा पर उतर आता है, अपना ही गुणगाण करने लगता है या अपने मित्रों से करवाने लगता है, जिससे दूसरों को कोफ्त होती है। मुख्यधारा के लेखन में एक किस्म की तटस्थता, समालोचना और वस्तुनिष्ठता की दरकार होती है। यदि हम इसका ध्यान रखें तो शायद हम ऐसे गैर-चिट्ठाकार स्वनामधन्य लेखकों को श्रेय लूटने और अपने हिसाब से चिट्ठाकारी का स्वरूप रेखांकित करने का मौका नहीं देंगे।

अनूप शुक्ल said...

सुधीश पचौरी जी का जो लेख है वह सराय पर छपे लेखों के संकलन 'बहुरुपिया शहर' के संदर्भ में खासकर है। ब्लाग के बारे में उनकी जानकारी बस इतनी ही है जितना वे लिखते हैं-
हिंदी ब्लाग लेखक की खाशियत यह है कि इसका जन्म सराय के साइबर स्पेस में ही हुआ है

ब्लाग के बारे में परिचयात्मक लेख भले ही कोई लिख ले लेकिन अंतत: ब्लागर ही इसकी कहानी लिखेंगे! किसी के कुछ लिखने से वह विधा उसके हाथ में नहीं चली जाती!

मोहिन्दर कुमार said...

आप चिडिया की आंख (लेखन) को छोड कर पेड (ब्लागिग की दुनिया) पर अधिक ध्यान दे रही हैं.. इसी लिये व्यथित हैं

Hariraam said...

बिल्कुल ठीक हैं आपके विचार- चिट्ठाकारी की विधा में अनेक सम्भावनाएँ हैं- नए आयामों के द्वार खोलने जरूरी हैं।

puff & mish said...
This comment has been removed by the author.
Neelima said...

मोहिन्दर कुमार जी आपकी बात बडी अजीब लगी . समय और संडर्भों से कटकर लिखन हो सकता है भला . आप कह रहें हैं अपना काम करों इधर उधर के पचडों में क्यूं पचडों में क्यूं पडती हो. वैसे भी नेरे लिए चिडिया की आंख लक्ष्य होगी या किसी अन्य की आंख यह मैं ही तय करूंगी न . रही बात मेरे व्यथित होने की तो मुझे लगता है आप चिंतित हैं मेरे लिए . सो धन्यवाद .

सृजन जी , आपके तर्कों में दम है ---"मुख्यधारा के लेखन में एक किस्म की तटस्थता, समालोचना और वस्तुनिष्ठता की दरकार होती है। यदि हम इसका ध्यान रखें तो शायद हम ऐसे गैर-चिट्ठाकार स्वनामधन्य लेखकों को श्रेय लूटने और अपने हिसाब से चिट्ठाकारी का स्वरूप रेखांकित करने का मौका नहीं देंगे।"


अनूप जी , मोहिन्दर जी मेरे कंसर्न को व्यथा का नाम दे दिया है पर मेरा कंसर्न वही है जो आपका है .