Wednesday, May 2, 2007

अविनाश का मोहल्‍ला कथादेश में

मई माह की कथादेश आज ही मिली। देखा तो इस बार फिर अविनाश ने इस पत्रिका में चिट्ठाकारी पर लिखा है। पता करने पर जानकारी मिली कि अब वे कथादेश में चिट्ठाकारी पर नियमित स्‍तंभ लिख रहे हैं। अप्रैल अंक और मई अंक दोनों के लेख व्‍यतिक्रम से प्रस्‍तुत हैं।
मई अंक से अविकल

इंटरनेट का मोहल्‍ला

रचना की रफ्तार से पड़ते हैं जहॉं वार

पूरी दुनिया अपने अपने कारोबार में लगी है। हमेशा से लगी रही है। कारोबारों के बगैर ये दुनिया शायद ऐसी नहीं होती, जैसी है। खेती, किसानी, मजदूरी, मालिक-मुख्तारी, नेतागिरी, दलाली इन कारोबारों का हिस्सा रही है। सबने इस दुनिया को अपने अपने तरीके से बनाने की कोशिश की है। इन सामूहिक कोशिशों की बदौलत ही ये दुनिया न स्वर्ग है न नरक। अपनी जैसी है, जहां खुशी, दुख, ईर्ष्या और दोस्ती-कुर्बानी के संस्कारों के साथ हम मौजूद हैं। फिर वो खलिश कौन सी है, जो हमारी इस दुनिया में एक और दुनिया खोजने के लिए चिंतित करती रहती है? गवैये के पास सबसे अच्छे सुर और खोज की चिंता रहती है, धावक उड़ने के ख्व़ाब देखता है। प्रेमचंद के पास पुश्तैनी थोड़ी जायदाद थी, बाद में अपना प्रेस हो गया। आराम से खा-पी सकते थे, क्यों बेवजह कहानियां लिखते थे। मुक्तिबोध के पास जितना दिमाग था, वो अच्छी कंपनी के डाइरेक्टर हो सकते थे, लेकिन अभिव्यक्ति की त्रासद पीड़ा ने उन्हें हमेशा गऱीब रखा। दरअसल बहुत कुछ होने और संतोष के परम भाव के बाद भी बची हुई थोड़ी-सी अतृप्ति आदमी को उस वीरान टीले पर ले जाती है, जहां खड़े होकर वह ज़ोर-ज़ोर से चीख सके। दुनिया को बता सके कि... हम भी हैं, तुम भी हो, आमने-सामने।

पूरी दुनिया में अपनी संवेदना को शब्दों के जरिये कहने की बेचैनी दरअसल यही है। हम भी हैं, तुम हो, आमने-सामने। कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें। लेकिन काग़ज पर लिखा हुआ बहुत देर तक एकालाप की तरह गूंजता है। लेखक की आंखों में घूमती हुई स्याही कई तरह के चित्र बनाती है, लेकिन इन चित्रों की कद्र होने में कई बार बहुत देर हो जाती है। इंटरनेट पर ब्लॉग्स के जरिये सामने आ रही लिखत-पढ़त को बहुत जल्दी कद्रदान भी मिल रहे हैं और थू-थू करने वाले भी। अंग्रेज़ी में कई ब्लॉगर हैं, जो दरअसल तकनीकवेत्ता हैं- जब भी फुर्सत मिलती है, वे कुछ टिप्स अपने ब्लॉग पर छोड़ते हैं। हिंदी में भी हैं, जैसे
रवि रतलामी (http://raviratlami.blogspot.com/), जितेंद्र चौधरी (http://www.jitu.info/merapanna/)... और ये लोग हर रोज़ या दो-तीन दिनों पर कुछ नयी बातें बताते हैं कि इंटरनेट से जुड़ी तकनीक में कहां-कहां क्या-क्या इज़ाफा हुआ है। हिंदी के लिए कितनी सहूलियतें उन इज़ाफों में शामिल हैं। लेकिन हिंदी में इन सूचनाओं को बांटने का आंदोलनी जज्ब़ा ज्य़ादा है। वरना एक हैं अमित अग्रवाल (http://labnol.blogspot.com/), अंग्रेज़ी ब्लॉगर, जिनकी एक दिन की कमाई है एक हज़ार डॉलर। यानी हर रोज़ क़रीब पैंतालीस हज़ार रुपये। हालांकि हिंदी कभी इस आमदनी तक नहीं पहुंचेगी, लेकिन अभिलाषा पालने वाले दर्जनों ब्लॉगर हिंदी में लगे-पड़े हुए हैं। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे हिंदी के बहुत सारे लेखक कभी अनायास बुकर या नोबल मिल जाने की ख्वाहिशों का खुशी देने वाला गम़ पाले हुए कुछ महान लिखने की कोशिश में रत हैं।

हिंदी का एक कवि किसी पत्रिका से हज़ार रुपये का मेहनताना पाकर परम प्रसन्नचित्त रहता है, वैसे ही हिंदी के बहुधा ब्लॉगर एक-एक टिप्पणी से निहाल रहते हैं। अभी तक सर्वाधिक टिप्पणियों रिकॉर्ड सृजनशिल्पी (
http://srijanshilpi.com/) नाम के एक सज्जन के खाते में है, जिनकी सुभाष चंद्र बोस को कर्ण बताने वाले एक शोधपरक रचना पर कुल ४२ क्रिया-प्रतिक्रिया हुई थी। अनूप शुक्ला नाम के एक सज्जन लिखते हैं- इन विचारों से यह लगता है कि गांधी-नेहरु राष्ट्रनायक न होकर एकता कपूर के सीरियल के कोई कलाकार थे जो तमाम दूसरे लोगों को अपने रास्ते से हटाने की जुगत में ही लगे रहे। अब ऐसी बहसों से हिंदी को आज़ाद हो जाना चाहिए, लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग अभी रामचरितमानस से शुरू होना चाह रही है। लेकिन कुछ संजीदा किस्म के लोग अब भी आगे की बहसों को उठा रहे हैं, जो वाकई समय की पेचीदगियों से मुठभेड़ करती हैं। कई सारे ब्लॉगरों को ऐसी टिप्पणियां मिलती रही हैं, जो किसी नाम से नहीं होतीं। वे बेनाम टिप्पणियां होती हैं। बेनाम प्रतिक्रियाओं के संसार की एक सहूलियत ये है कि इसमें नौकरियां बच जाती हैं और दोस्त दुश्मन होने से रह जाते हैं, लेकिन एक दूसरी सहूलियत है आज़ादी के एक नये क्षितिज की है। इन बेनाम चादरों की सहूलियतों पर हिंदी ब्लॉगिंग में जम कर बहस हुई।

मसिजीवी (
http://masijeevi.blogspot.com/) नामधारी ब्लॉगर ने कहा- मुझे मुखौटा आज़ाद करता है... ध्यान दें कि खत़रा यह है कि यदि आप इसे वाकई मुखौटों से मुक्त दुनिया बना देंगे तो ये दुनिया बाहर की 'रीयल` दुनिया जैसी ही बन जाएगी- नकली और पाखंड से भरी। आलोचक, धुरविरोधी, मसिजीवी ही नहीं, वे भी जो अपने नामों से चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग) करते हैं, एक झीना मुखौटा पहनते हैं, जो चिट्ठाकारी की जान है। उसे मत नोचो- ये हमें मुक्त करता है।

हिंदी ब्लॉगिंग इंटरनेट पर अभिव्यक्ति का ऐसा ईजाद है, जो पर्देदारी को आज़ादी का एक और आयाम बताता है और जिस पर्देदारी में आप अपना आस-पड़ोस बिना संकोच के उघाड़ सकते हैं। और उस उघड़न पर चंद मिनटों में लाठी-बंदूक का वार भी पड़ जाएगा। सो इंतज़ार कीजिए, हिंदी ब्लॉगिंग आने वाले वक्त में हज़ारों मंटो-इस्मत की कतार खड़ी करेगा।

अब आखिऱ में एक ब्लॉग चर्चा। अभय तिवारी मुंबई में सिनेमा-सीरियल के लिए लिखते हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक नन्हा-सा चिट्ठा लिखा था- ऐ लम्बरदार, जियादा लंतरानी ना पेलो। कुछ इस तरह...

गांव-कस्बे के सहज बोल बचन हैं- ऐ ना पेलो के अलावा, यहां जो बाकी शब्द हैं, उनका मूल अरबी भाषा में है। लम्बरदार बिगड़ा हुआ रूप है अलमबरदार का। अलम का मायने है झंडा, और बरदार फ़ारसी का प्रत्यय है, जिसका अर्थ है उठाने वाला। तो झंडा लेकर आगे-आगे चलने वाले को अलमबरदार कहा जाता है। और अपनी देशज भाषा में भी इसका लगभग यही अर्थ है। नेता मुखिया के लिए प्रयुक्त होता है। जियादा में ज़ियाद: फेरबदल नहीं हुई, मगर लन्तरानी! लन्तरानी का अर्थ है, 'तू मुझे नहीं देख सकता`। अयं? ये शब्द है कि वाक्य? असल में ये वाक्य ही है, जो ईश्वर ने मूसा से कहा है। जब मूसा ने उनको देखने की इच्छा प्रगट की। ईश्वर का यहां पर तौर ये है कि कहां मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर और कहां तू एक अदना मनुष्य। इसी मूल भावना को ध्यान में रख कर इस वाक्य का प्रयोग एक मुहावरे के बतौर होता है। बहुत-बहुत बड़ी बड़ी बातें पेलने वाली प्रवृत्ति को चिन्हित करने के लिए। इतनी मासूम सी बात है, क्या आप को लग रहा है कि मैं लनतरानी पेल रहा हूं?

अगली बार हिंदी ब्लॉगिंग की भाषा के चंद रूपक पेश करेंगे।
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(अप्रैल अंक के स्‍तंभ को पोस्‍ट करने की व्‍यवस्‍था भी की जा रही है। लिंकन आदि करने के पश्‍चात बाद में पोस्‍ट किया जाएगा।)


15 comments:

Jitendra Chaudhary said...

अच्छा लगा देखकर और हाँ अपना नाम देखकर भी। अविनाश बधाई के पात्र है।नीलिमा जी को भी धन्यवाद।

हम सभी चिट्ठाकारों को अपने अपने स्तर पर हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रचार करना है, जितना अधिक प्रचार होगा, उतने अधिक लोग आगे आएंगे। हर लेखक अपने साथ कम से कम १० नए पाठक जरुर लाएगा। अब चिट्ठाकारी का विस्तार कई कई गुना होना चाहिए, अब वन टू वन, ना होकर मैनी तो मैनी वाली स्थिति है।

अगले लेख का भी इन्तज़ार है।

Udan Tashtari said...

बढ़िया है, अगले आलेख का इंतजार है.

Divine India said...

मैं पिछ्ले 5 महीने से ब्लाग की दुनियाँ में हूँ और शायद कुछ गलतियाँ भी हुई नया होने के कारण पर मैने यह देखा की जो उपर की सीढ़ियों पर बैठे है दरअसल they don't even know how to tackle the situation n how to behave...शब्द तो लाजबाव होते है…।
हाँ यह लेख काफी अच्छा लगा जो कई स्तर पर
सही रुप में व्याख्या कर पाया है…बधाई!!

Tarun said...

समीर जी की एक-दो पोस्ट में इससे कहीं ज्यादा टिप्पणी पड़ी हैं, कह नही सकता कि इस सर्वाधिक टिप्पणी की रिकार्ड संख्या किस आधार पर यहाँ बतायी गयी है। लेकिन चलो अच्छा है जितने ज्यादा लोग अलग अलग लिखते रहें, अविनाश को बधाई।

अविनाश said...

भाई, सृजन शिल्पी की सूचना के आधार पर मैंने सबसे ज़्यादा हिट्स का ज़िक्र किया. अगर ग़लत है, तो सही कर दें, अगले अंक में भूल सुधार छपवा देंगे. लेकिन अगर वाक़ई ये भूल है, तो सृजन शिल्पी ने ग़लत सूचना दी है. शुक्रिया.

Srijan Shilpi said...

अविनाश जी द्वारा लगाए गए उपर्युक्त आरोप के संदर्भ में स्पष्टीकरण हेतु अविनाश से 13 अप्रैल को हुई चैट पर बातचीत के अंश पेश हैं:

avinashonly@gmail.com: आपकी किस रचना पर सबसे ज्‍यादा टिप्‍पणी आयी थी? उसका लिंक भेजेंगे?
15:12 me: देता हूं, क्या कोई रिसर्च हो रहा है, या फिर किसी को जवाब में कोट करना है
avinashonly@gmail.com: कथादेश के कॉलम में ज़‍िक्र करना है...
me: सर्वाधिक टिप्पणी इस पोस्ट पर आई http://srijanshilpi.com/?p=87


उन्होंने मुझसे मेरी अपनी उस पोस्ट के बारे में पूछा था, जिसपर सर्वाधिक टिप्पणियां प्राप्त हुई हों, न कि सभी हिन्दी चिट्ठाकारों की पोस्टों के संबंध में। हां, जहां तक मुझे याद आता है संभवत: जनवरी माह में फोन पर अविनाश से एक बार बात हो रही थी तो उन्होंने हिन्दी चिट्ठों के पोस्टों पर मिलने वाली टिप्पणियों की संख्या के संबंध में कुछ पूछा तो मैंने जिक्र किया था कि टिप्पणियाँ आम तौर पर अधिक से अधिक 30 तक आ जाती हैं, लेकिन कभी-कभी जब कोई विवादास्पद विषय होता है तो इससे ज्यादा भी टिप्पणियाँ आ जाती हैं, मसलन मेरे सुभाष संबंधी लेख पर लगभग 40 टिप्पणियाँ आईं थीं। मैंने कहीं आधिकारिक रूप से उद्धृत करने के लिए यह दावा नहीं किया था। किस चिट्ठाकार की किस पोस्ट पर अब तक सर्वाधिक टिप्पणी आई, यह तो सार्वजनिक रूप से ही पूछा जाए तभी लोग अपनी-अपनी पोस्ट के बारे में बता सकेंगे। अभी हाल ही में 25 अप्रैल, 2007 को जीतू भाई द्वारा नारद की जिम्मेदारी छोड़ने की पेशकश वाली पोस्ट पर उनको 49 टिप्पणियाँ मिलीं। तो, टिप्पणियों के रिकार्ड तो बनते-टूटते रहते हैं। यह न तो कोई उल्लेखनीय उपलब्धि है और न ही इतना महत्वपूर्ण मुद्दा कि इस पर एक नया विवाद शुरू किया जाए।

अविनाश की मानसिकता से मैं भलीभांति अवगत हूं। जिन-जिनको उसकी बदौलत कोई प्रचार मिलता हो, या मिलने की संभावना हो वे जरूर ताली बजाएँ।

अविनाश said...

सृजन, मैं अब दावे के साथ कह सकता हूं कि आप शातिर आदमी हैं. आपसे मौखिक बातचीत हुई थी और आपने कहा था कि आपको हिंदी चिट्ठाकारी में सबसे ज़्यादा पढा जाता है. ये भी कि सबसे ज़्यादा टिप्पणी का रिकार्ड आपके ही नाम है. तभी जब मैं लिख रहा था, तो आपसे उक्त पोस्ट की तफसील चाही थी.

संजय बेंगाणी said...

अविनाश को बधाई.

Jitendra Chaudhary said...

इसे कहते है सूत ना कपास, जुलाहों मे लट्ठम लट्ठा। (मुहावरे का प्रयोग है, एक ही शहर मे हो दोनो, कंही चरितार्थ मत कर देना।)

वैसे क्या फरक पड़ता है, कि किसको ज्यादा पढा जाता है और सबसे ज्यादा टिपिआया जाता है। पड़ता है का?

आप दोनो महानुभावों से निवेदन है कि यहाँ पर फ़डडा मत करें, बेचारी नीलिमा का सोचें। कंही टिप्पणियों का रिकार्ड यहीं ना टूट जाए।

Srijan Shilpi said...

@ अविनाश,
फिर एक बार आरोप और सफेद झूठ। दरअसल आप हो ही इसके पुलिंदे। इतने दिनों में इसका परिचय कई बार दे चुके हो। आपकी मुझसे फोन पर दो महीने से कोई बातचीत शायद फोन पर नहीं हुई है। जिस बातचीत का आप जिक्र कर रहे हो वह संभवत: जनवरी में हुई थी। चिट्ठाकारी करते हुए इतने दिन हो गए आपको, क्या इतने नादान हो कि यह नहीं जानते कि हिन्दी चिट्ठाकारी में किस-किसको कितना पढ़ा जाता है। आप जैसे सक्रिय, विवादित और पत्रकारीय नज़र वाले चिट्ठाकार ने ऐसी गफ़लत कैसे की?

आप यह बताओ कि मैंने चैट के जो अंश ऊपर पेश किए हैं, उसमें क्या शातिर भाव नजर आता है आपको? क्या मैं पूरी बातचीत पोस्ट करूं?

ख़ैर, लगता है कि आगे से आपसे बातचीत भी बंद करनी पड़ेगी या फिर फोन पर हुई बातचीत का भी रिकॉर्ड रखना पड़ेगा।

Neelima said...

शुक्रिया जितेंद्रजी,
डिवाइन जी, पता नहीं आपकी बात संदर्भ क्‍या है।
सर्वाधिक टिप्‍पधियों वाले मसले पर हमें जिंतेंद्रजी की राय सही लगती है कि इसे अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिए।
साफ कर रही हूँ कि यह लेख यहॉं क्‍यों आया है- इस ब्‍लॉग विशेष का उद्देश्‍य हिंदी चिट्ठाकारी के पक्षो पर शोधमय दृष्टि डालना है- इस लेख को जब कथादेश में देखा तो पता किया कि क्‍या अविनाश इसे अपने चिट्ठे पर दे रहे हैं कि नही, फिर आग्रह कर उनसे दोनों लेख मंगा लिए और प्रकाशित कर रही हूँ।
विवाद की कोई गुंजाइश इस मसले पर मुझे नहीं दिखती।

Shrish said...

बधाई अविनाश को इस पहल के लिए।

Debashish said...

अप्रैल की किस्त की प्रतीक्षा रहेगी

नीरज दीवान said...

अरे ये क्या हो रहा भैये?? ऐसे ही टीपाकारी चलती रही तो यहां नीलिमा जी के पन्ने पर नया रिकार्ड बन जाएगा. हाईएस्ट टिप्पणी होल्डर का. ज़रा बचके..
कहीं भी छपे कैसा भी छपे.. छपते रहे .. छपाते रहो.. बजाते रहो.

अनूप् शुक्ल said...

नीलिमाजी आपकी मेहनत सफल हुयी! यह लेख पड़वाने के लिये शुक्रिया!