Friday, July 6, 2007

कथादेश में इंटरनेट का मोहल्‍ला

कथादेश में अविनाश ने इस बार चिट्ठाकारी की भाषा के ताजा विवाद पर अपने विचार रखे हैं-

फेंस के दूसरे किनारे की रेत में लिथड़ी हिंदी
अविनाश
अक्सर हिंदी में साहित्यिक दुकानों की चर्चा होती है. जिनकी जितनी बड़ी दुकान, उसके गुण ग्राहक उतने ही ज्य़ादा. ऐसी ही एक दुकान में इन दिनों अभिधा, लक्षणा और व्यंजना के कारोबार को लेकर हिंदी में चर्चा का बाज़ार गर्म है. नया ज्ञानोदय के नवलेखन अंक, पार्ट वन और टू में युवा लेखकों को जिस अंगभीरता से प्रस्तुत किया गया है, वही ये बताने के लिए काफी है कि संपादक की मंशा और समझ का स्तर क्या है. ये विवाद हिंदी की पत्रिकाओं से अब तक अछूता है, लेकिन ब्लॉगिंग में इस पर खूब बहसें हुईं, हो रही हैं. कर्मेंदु का ज्ञानपीठ के मालिक के नाम पत्र और एक इंटरव्यू (जिसमें उन्होंने जोड़-तोड़ और जाती ज़िंदगियों में जिज्ञासा से भरी हिंदी की ८० के बाद की साहित्यिक बिरादरी पर निशाना साधा), और कुमार मुकुल के ज्ञानोदय की प्रस्तुति पर संक्षिप्त छिद्रान्वेषण आलेख ब्लॉग पर आते ही चर्चा और धमकियों और प्रतिक्रियाओं की गतिविधियां अचानक बढ़ गयीं. यानी जो बहस किन्हीं कारणों से काग़ज की कश्ती से किनारे कर दी गयी, वो इंटरनेटीय अनंत में अब भी तैर रही है. वह भी इतनी आसान पहुंच में, कि कोई भी हाथ उठा कर इन्हें अपनी मुट्ठी में पकड़ सकता है और उन्हें अपनी फूंक से फिर उड़ा भी सकता है.
इस तरह हिंदी के गलियारे में ब्लॉगिंग के बढ़ते हस्तक्षेप का आगे आने वाले दिनों में विस्तार ही होगा. ज़ाहिर है, ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की सबसे लोकतांत्रिक स्थिति होगी. ज़ाहिर है, मन का गुबार उन वर्जित शब्दों में भी यहां निकलने की गुंजाइश है, जिसकी वजह से अभिजात और भदेस के बीच हिंदी में झगड़े का वातावरण रहा है. हालांकि ब्लॉगिंग के बढ़ते (जं)जाल में दुकानें इंटरनेटीय अनंत में भी सज रही हैं. एक ऐसी ही दुकान का ज़िक्र फिलहाल करते हैं, जिसने एक मामूली से शब्द पर हिंदी का एक ब्लॉग प्रतिबंधित कर दिया.
नारद हिंदी का लोकप्रिय एग्रीगेटर है, जो हिंदी ब्लॉग्स के अपडेट्स अपने पन्ने पर फ्लैश करता है. ऐसे और भी पन्ने हैं, लेकिन नारद इसलिए लोकप्रिय है, क्योंकि इसकी सजावट सुखद है, और ये सामूहिक रूप से संचालित होता है, और सभी संचालक हिंदी सेवा के नाम पर नारद के लिए श्रमदान करने से पीछे नहीं हटते. यही वजह है कि नारद सिर्फ एक एग्रीगेटर नहीं है, एक समूह है, जो इंटरनेट पर हिंदी के उज्ज्वल भविष्य की कामना की वैचारिक धरातल पर किसी ब्लॉग को अपने पन्ने पर जगह देता है या नहीं देता है.
कहानी दिसंबर या जनवरी में एक हादसे से शुरू हुई, जब अभिषेक श्रीवास्तव नाम के युवा लेखक-पत्रकार के ब्लॉग (janpath.blogspot.com) को बैन किया गया. गालियों से भरी हुई बनारसी ज़बान का इस्तेमाल करने की वजह से. उस वक्त विरोध की आवाज़ें इसलिए भी नहीं उठी थीं, क्योंकि नारद में बहुसंख्यक जमात प्रतिबंध जैसे संगीन मामलों पर या तो नासमझ थे या फिर उन्हें लगता था कि समाज के परिष्कार के लिए प्रतिबंध एक अनिवार्य सामाजिक हरकत है. लेकिन इस बार नारद के लिए उस हादसे को दोहराना भारी पड़ा.
कहानी असगर वज़ाहत की थी, जो प्रतिरोध नाम के हिंदी ब्लॉग पर छपी- शाह आलम कैंप की रूहें. गुजरातों दंगों के इस मार्मिक विवरण पर नारद संचालकों में से एक संजय बेंगाणी ने टिप्पणी की- अच्छी कल्पना की उड़ान है. आप इसी प्रकार विषारोपण करते रहें, एक दिन ज़रूर ज़हर फैलेगा. यह एक सांप्रदायिक टिप्पणी थी, क्योंकि एक समुदाय विशेष की पीड़ा के बयान की प्रतिक्रिया में की गयी थी. इससे कई लोग तैश खाये, लेकिन राष्ट्रीय सहारा के लिए फ्रीलांसिग करने वाले पत्रकार राहुल कुछ ज्यादा ही उखड़ गये. उन्होंने अपने ब्लॉग बजार पर अवैध अतिक्रमण (bajaar1.blogspot.com) पर लिखा- बेंगाणी एक गंदा नैपकिन है. नारद को यह विशेषण नागवार गुज़रा. बजार पर बैन लगा दिया गया. इस बैन को लखनऊ, हिंदुस्तान में काम करने वाले पत्रकार नासिरुद्दीन (dhaiakhar.blogspot.com) ने तकनीक की सत्ता की तानाशाही कहा. विजेंद्र (मसिजीवी), प्रमोद सिंह (अज़दक), अभय तिवारी (निर्मल आनंद), प्रियंकर (समकाल), अफलातून (समाजवादी जन परिषद), इरफान (टूटी हुई बिखरी हुई), रियाज़ुल हक़ (हाशिया), प्रत्यक्षा (pratyaksha.blogspot.com) से लेकर लंदन में रहने वाले अनामदास (anamdasblog.blogspot.com) और कई अन्य ब्लॉगरों (चिट्ठाकारों) ने इस प्रतिबंध का विरोध किया, लेकिन तमाम लोगों की आवाज़ें अनसुनी कर दी गयी. यानी नारद ने साफ कर दिया कि असहमत लोगों का उनके समूह में कोई काम नहीं.
मोहल्ले पर हमने अपनी असहमति दर्ज की, 'नारद कुछ लोगों का है. ये तकनीक की दुनिया के सक्षम लोग हैं. इन्होंने हिंदी के लिए अपना कीमती वक्त होम किया. इसलिए, क्योंकि इन्हें हिंदी आती है. इन्हें वे प्रार्थनागीत आते हैं, जो मंगलवारी और शनिवारी मंदिर परिक्रमाओं के दरम्यान गाये जाते हैं. वे गीत भी, जो स्कूल की पहली घंटी शुरू होने के पहले कतार में खड़े होकर बच्चे अपनी अधमुंदी आंखों से गुनगुनाते-चिल्लाते हैं. कुछ कुछ नमस्ते सदा वत्सले जैसा गीत भी, जो इस देश से एक पूरी नस्ल को उखाड़ फेंकने की चर्चा शुरू करने के पहले गाया जाता है. ऐसी हज़ार-हज़ार धुनों में सीखी हुई इनकी हिंदी की पवित्रता पर मुझे कोई संदेह नहीं है. ये अपनी हिंदी की सेवा करते रहें, हम इनके यश गाते रहेंगे. मैं अपने लिए एक दूसरी हिंदी चुनना चाहता हूं. थोड़े शब्दों की पवित्र दुनिया चुनने के बजाय वे सारे शब्द अर्जित करना चाहूंगा, जो सभ्यता की फेंस नदी के उस किनारे की रेत में पड़े हैं. मैं मुहावरों की तरह प्रयोग में आने वाली गाली-मिश्रित-हिंदी में भी अभिव्यक्त होना चाहता हूं ताकि मेरे अंतर की स्वीकारोक्तियों का सच्चा मुज़ाहिरा हो सके. इसका एक उदाहरण है, तेरी भैण की... नैपकिन तो कुछ भी नहीं है.`
इस तरह कुछ और ब्लॉगरों ने भी नारद को अलविदा पत्र लिखा. नारद के सांप्रदायिक चरित्र के मद्देनज़र स्चेच्छा से इस एग्रीगेटर से अलग होने वालों की हमारी और हम जैसों की मंशा पर मसिजीवी ने पलटवार किया. कहा कि अगर वैचारिक असहमति, व्यावसायिक कारण, जानकारी के अभाव, आलस्य, जिद, राजनीति या किसी अन्य कारण से किसी चिट्ठाकार को यह लगता है कि उसे नारद की ज़रूरत नहीं है तो इससे स्वयमेव यह सिद्ध नहीं होता कि नारद या हिंदी चिट्ठाकारी को भी उस चिट्ठे की ज़रूरत नहीं है. हो सकता है कि इस बेरुखी के बाद फीड लिये जाने से चिट्ठाकार को नागवार गुज़रे, पर इस पक्ष को साफ समझ लिया जाए कि सार्वजनिक चिट्ठे की फीड किसी की बपौती नहीं है- खुद चिट्ठकार की भी नहीं. चिट्ठे पर क्या लिखा जाए, यह तो चिट्ठाकार ही तय करेगा, लेकिन यदि चिट्ठा सार्वजनिक है, तो उसे कौन पढ़े, इसे तय करने का अधिकार चिट्ठाकार को नहीं है. चिट्ठापाठक होने के नाते हर सार्वजनिक फीड पर सर्वजन का अधिकार है.
यानी सांप्रदायिकता से उठी बहस अभिव्यक्ति की निजता और सार्वजनिक(ता) की तरफ मुड़ गयी... और ये बहस अभी जारी है. नारद और प्रतिबंध मामले में ऊंट किस करवट बैठेगा- फिलहाल तय नहीं है. लेकिन हिंदी में सांप्रदायिक नारद के समानांतर और-और फीड एग्रीगेटर की मांग बढ़ी है, ये ज़रूर साफ हो गया है.
http://mohalla.blogspot.com

5 comments:

Rama said...

तो फिर क्यों नहीं शुरू किया जा रहा है समानान्तर व स्वतंत्र एग्रीग्रेटर बनाने का काम. यथाशीघ्र अमल किया जाना चाहिये.

Sanjeeva Tiwari said...

आपके इस तथ्या, शोध व चिंतन के लिये साधुवाद ।

Pramod Singh said...

आपको हमारे टिपियाने की बेकली थी तो लीजिए, हम लात लगाने चले आए.. ये बताइये, आपने बकियों को हाईपर लिंक में साट लिया तो ये जो थोड़े नाम और थे: अज़दक, निर्मल आनंद, समकाल, समाजवादी जन परिषद, टूटी हुई बिखरी हुई, हाशिया- इनके साथ क्‍या मुसीबत थी, इनमें बबूल के कांटे लगे थे, या इनसे आपको वैसा दुलार नहीं है? कि आपने इनका हाईपर लिंक नहीं जोड़ा! क्‍यों नहीं जोड़ा? खामखा दो कौड़ी के इस सुख से वंचित करके सुबह-सुबह हमें रुसवा दिया!

Neelima said...

प्रमोद जी हमने तो बडे चाव और दुलार से आपको अपनी 'कौन है असल फुरसतिया' वाली पोस्ट में लिंकित किया था पर आप ध्यान ही नहीं दिये !अब वादा करते हैं कि अब आपको एसे रुसवा नहीं होना पडेगा और आशा है आप भी हमें रुसवा नहीं करेंगे आगे से ;)

Divine India said...

हमेशा आपका कुछ शोध परक रचना पढ़ने का मौका मिलता है…मैं चूंकि फिल्म क्षेत्र से जुड़ा हूं तो यह मामला वहाँ ज्यादा प्रखर रुप में उजागर है और ज्यादा संवेदनशील भी…जब हम कहते हैं कि सेंसर वोर्ड को हटा देना चाहिए और जो कलाकार को पूर्ण स्वतंत्रता दे…मगर मैं अभी भी यह मानता हूँ कि भारत में यह परम आवश्यक है कि अंकुश रहना चाहिए क्योंकि अभी-भी उस स्वतंत्रता का मतलब हमें मालूम ही नहीं…हम तो बियोंसे,स्पियर्स,हिल्टन से प्रभावित दिखते है इसी कारण भारत में सिनेमा का स्तर विश्व के अन्य क्षेत्र से बहुत नीचे है…
यही यहाँ भी लागू होता है ,अभी हमे काफी मैच्योर होना है…"अभी दिल्ली बहुत दूर है"